विस चुनाव : इस सीट से जुड़ा है एक मिथक, आज तक कोई नही जीता लगातार दो बार

भोपाल

मध्य प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही दलों को नेता जोर-शोर से प्रचार में जुट गए हैं। राज्य में दोनों ही दल जीत के लिए दांव खेल रहे हैं और कांग्रेस चाहती है कि 15 साल का सूखा खत्म कर सत्ता में वापसी करे। वही भाजपा भी चौथी बार सत्ता बनाने को आतूर है।लेकिन मध्यप्रदेश की एक विधानसभा सीट ऐसी है जिसको लेकर एक मिथक जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश की सीमा से सटी अटेर विधानसभा में कोई भी व्यक्ति यहां लगातार दो बार विधायक का चुनाव नहीं जीता है। हां, यह जरूर है कि पार्टी लगातार 2 बार जीती है। हेमंत कटारे के पिता सत्यदेव कटारे इसी विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे और विपक्ष में नेता प्रतिपक्ष थे। लेकिन उनके निधन के बाद 2017 में उपचुनाव में हेमंत कटारे यहां से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। हालांकि पिछले दिनों रेप के कथित आरोप के बाद उनकी छवि जरूर धूमिल हुई है। लेकिन इस बार के चुनाव में यहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर होने वाली है। बीजेपी इस मुद्दे को भुनाते हुए सीट को दोबारा हासिल करने के लिए पूरी जोर लगा रही है।

1980 में कांग्रेस से परशुराम भदौरिया और 1985 में कांग्रेस से सत्यदेव कटारे जीते। 2013 में कांग्रेस से सत्यदेव कटारे और उनके निधन के बाद 2017 के उपचुनाव में कांग्रेस से उनके बेटे हेमंत कटारे जीते। 1952 से 2017 के उपचुनाव सहित अटेर में 15 बार हुए विधानसभा चुनाव में 9 बार कांग्रेस, 3 बार भाजपा, 2 बार बीएसपी और 1 बार जनता पार्टी जीती।वर्ष 2013 का चुनाव और 2017 के उपचुनाव में भाजपा की हार का बड़ा कारण भितरघात माना जाता है। दिग्गजों में समन्वय करना बड़े नेताओं के लिए चुनौती साबित हो रहा है।यहां के जातीय समीकरण की बात की जाए तो इस सीट पर ठाकुर (भदौरिया), ब्राह्मण मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं। नरवरिया, कुशवाह, बघेल, अजा, मुस्लिम मतदाताओं का भी प्रभाव यहां रहता है।यानी अटेर में मिशन 2018 की बाजी वही जीतेगा। जो यहां सभी समीकरणों को को साधने में सफल होगा।

अटेर में इन दिनों सियासत पूरे उफान पर है। चाहे कांग्रेस के नेता हो या बीजेपी हो फिर किसी और दल का। एक-दूसरे पर आरोप लगाने का कोई मौका नहीं चूकते। कांग्रेस विधायक हेमंत कटारे पर फिलहाल कथित रेप का आरोप है।वे कांग्रेस से टिकट के प्रमुख दावेदार अब भी हैं, वही भाजपा सत्ताधारी पार्टी होने के नाते मजबूत स्थिति में है।लेकिन क्षेत्र से कई कद्दावर नेता होने के कारण चुनाव के समय भाजपा में अंतर्कलह और भितरघात सामने आना तय है।फिलहाल भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और पूर्व विधायक डॉ अरविंद भदौरिया इस दौड़ में आगे है।

इन मुद्दो के कारण चर्चा में रही यह सीट 

इन सब के बावजूद यहां मुद्दों की कोई कमी नहीं है। बुनियादी सुविधाओं की कमी के अलावा यहां अवैध रेत खनन का मुद्दा इस बार चुनाव में सियासी मुद्दा जरूर बनेगा। वहीं शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं भी बदहाल हो चुकी हैं।इसके अलावा बेरोजगारी, गांवों तक स्मैक, गांजा और अवैध शराब का कारोबार बड़ी समस्या। फूफ में बस स्टैंड नहीं है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी अटेर पिछड़ा है। अधिकारी अटेर में नहीं रुकते हैं। इससे लोगों को अपने काम करवाने के लिए भिंड तक जाना पड़ता है। प्रशासनिक चुस्ती की कमी है।