BJP के गढ़ में 30 साल से कांग्रेस को जीत का इन्तजार, कभी सिंधिया वंश की राजकुमारी को मिली थी हार

भिंड। भाजपा का गढ़ मानी जाने वाली भिंड दतिया लोकसभा सीट पर रोचक जंग है| यहां तीस साल से कांग्रेस को जीत का इन्तजार है| इस सीट से भाजपा ने संध्या राय को टिकट दिया है वहीं कांग्रेस ने देवाशीष जरारिया को चुनावी मैदान में उतारा है। इस सीट पर कभी विजयाराजे सिंधिया चुनाव जीत चुकी हैं,तो वहीं उनकी बेटी और राजस्थान की पूर्व सीएम वसुंधरा राजे भी इस सीट पर किस्मत आजमा चुकी हैं। 1984 के चुनाव में वसुंधरा राजे ने यहां से चुनाव लड़ा था,लेकिन उनको हार का सामना करना पड़ा था। फिलहास इस सीट पर पिछले आठ चुनाव से भाजपा का ही कब्जा है। कांग्रेस को इस सीट पर अब तक सिर्फ तीन बार ही जीत नसीब हुई है।  

यहां तीस साल के सूखे को ख़त्म करना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है| भिंड लोकसभा सीट पर छठे चरण में 12 मई को वोटिंग होनी है| बीजेपी के इस मजबूत किले में सेंध लगाने के लिए कांग्रेस ने अपने सबसे कम उम्र के युवा चेहरे को मैदान में उतारा है| इस रिजर्व सीट से देवाशीष जरारिया कांग्रेस के उम्मीदवार हैं| वहीं अपना गढ़ बचाने भाजपा ने अपने वर्तमान सांसद डॉ भागीरथ प्रसाद का टिकट काटकर दिमनी की पूर्व विधायक संध्या राय को मौका दिया है।   

 राजमाता जीती, वसुंधरा राजे को मिली हार 

मध्य प्रदेश की भिंड लोकसभा सीट बीजेपी के मजबूत किले में से एक है| इस सीट पर कभी विजयाराजे सिंधिया चुनाव जीत चुकी हैं|  1984 के चुनाव में वसुंधरा राजे ने यहां से चुनाव लड़ा था, लेकिन उनको हार का सामना करना पड़ा था| 1984 से पहले सिंधिया राजवंश के राजमाता विजयाराजे और माधवराव में जहां से भी और जिस पार्टी से चुनाव लड़ा वो वहां से जीता। लेकिन, राजनीति के मैदान में पहली बार उतरी इस राजवंश की राजकुमारी वसुंधरा राजे 1984 में यहां से लोकसभा का चुनाव हार गईं। इसके बाद उन्होंने मध्य प्रदेश की राजनीति से तौबा कर लिया। वसुंधरा राजस्थान चली गई और फिर वहां की दो बार मुख्यमंत्री बनी। 1971 विजयाराजे सिंधिया भी यहां का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।   


14 चुनाव, 10 भाजपा, 3 कांग्रेस जीती

भिंड सीट पर 1962 से 2014 तक 14 बार चुनाव हुआ। पहला चुनाव कांग्रेस के पूरनप्रसाद जीते थे। इसके बाद दो चुनाव 1967 में यशवंत सिंह कुशवाह, 1971 में ग्वालियर रियासत की राजमाता विजयाराजे सिंधिया जीती। 1977 का चुनाव बीएलडी से रघुवीर सिंह मछंड जीते। बीएलडी से यह सीट 1980 और 1984 के चुनाव में कांग्रेस के पास चली गई। कांग्रेस से कालीचरण शर्मा और कृष्ण सिंह जूदेव जीतकर संसद पहुंचे। कृष्ण सिंह जूदेव के बाद से भिंड सीट पर कोई कांग्रेस जीत नहीं पाया। 1989 में हुए चुनाव में यह सीट भाजपा के नरसिंह राव दीक्षित ने ऐसी छीनी कि अब तक भाजपा के पास है। भिंड सीट को जीतने के लिए 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने अपने मित्र पत्रकार उदयन शर्मा को मैदान में उतारा, लेकिन उन्हें भी 38 हजार 854 वोट से हार का मुंह देखना पड़ा। वैसे यहां हार की वजह कांग्रेस की आपसी गुटबाजी ही रहती है।


8 विधानसभा आती है भिण्ड लोकसभा सीट में 

यहां बता दें कि भिंड लोकसभा सीट के अंतर्गत विधानसभा की 8 सीटें आती हैं। जिसमें यहां पर अटेर,भिंड, लहार,मेहगांव,गोहद,सेवढ़ा,भाण्डेर व दतिया विधानसभा सीटें हैं। इन 8 विधानसभा सीटों में से अभी हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में 5 पर कांग्रेस, 2 पर बीजेपी और 1 पर बसपा का कब्जा है। यहां के राजनीतिक इतिहास को देखें तो बीजेपी ने यहां पर सबसे ज्यादा जीत हासिल की है। भाजपा को यहां पर 8 चुनावों में और कांग्रेस को सिर्फ 3 चुनावों में जीत मिली। ऐसे में यह सीट भाजपा के दबदबे वाली सीट कही जाती है।

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