चुनावी रणनीति में कांग्रेस ने मारी बाजी, डैमेज कंट्रोल में चूकी भाजपा

भोपाल। मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनावों की शुरुआत हो चुकी है| कांग्रेस बीजेपी में जबरदस्त कांटे की टक्कर भी नज़र आ रही है| लेकिन इस बीच कांग्रेस की रणनीति बीजेपी के मुकाबले ज्यादा कामयाब होती दिख रही है|  संगठन के मामले में बीजेपी कांग्रेस से कमज़ोर साबित होती जा रही है| चुनावों के बीच कांग्रेस की टीम में बीजेपी के दिग्गज भी शामिल होते चले गए और बीजेपी अपने रुठे हुए नेताओं को वक्त रहते नहीं मना सकी| लिहाज़ा बालाघाट, शहडोल और जबलपुर में बीजेपी को बागियों ने बड़ा नुकसान पहुंचाया है|

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कांग्रेस अध्यक्ष बनने के सालभर के दौरान ही अपने कुशल राजनीति की मिसाल पेश की है| यही वजह रही की मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने 15 साल का सूखा खत्म किया| अब जब लोकसभा चुनाव सिर पर हैं तब कमलनाथ और कांग्रेस ने एक बार फिर अपनी रणनीति के जरिए बीजेपी को बैकफुट पर ला दिया है| 


ऐसे मारी बाजी


-बुरहानपुर से निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा ने मुख्यमंत्री कमलनाथ से मुलाकात के बाद अरुण यादव के खिलाफ अपनी पत्नी का नामांकन वापस लेने का ऐलान कर दिया है|

-गुना-शिवपुरी से कांग्रेस प्रत्याशी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बसपा के प्रत्याशी चुनावों के पहले ही लोकेंद सिंह राजपूत कांग्रेस में ही शामिल करा लिया|

-शिवराज सरकार में मंत्री रहे के एल अग्रवाल को भी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने चुनावों के दौरान कांग्रेस में शामिल कराकर बीजेपी को बड़ा झटका दिया है|.

-पहले चरण की जिन 6 लोकसभा सीटों पर वोटिंग हुई है| वहां बीजेपी को अपनों ने ही नुक्सान पहुंचाया है| बीजेपी वक्त रहते रुठे नेताओं को नहीं मना सकी| जिसका फायदा सीधे तौर पर कांग्रेस प्रत्याशी को मिला है| 

-शहडोल संसदीय क्षेत्र की तो बीजेपी से मौजूदा सांसद ज्ञान सिंह टिकट न मिलसे की नाराजगी के चलते पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के प्रचार के लिए भी घर से नहीं निकले|

-बालाघाट से बीजेपी के मौजूदा सांसद बोधसिंह भगत टिकट कटने की वजह से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं|

-युवा मोर्चा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और जबलपुर में कार्यकर्ताओं के तगड़े नेटवर्क वाले धीरज पटैरिया को भी पार्टी नहीं मना सकी...लिहाज़ा पटैरिया ने वोटिंग के पहले कांग्रेस का दामन थाम कर बीजेपी को नुक्सान पहुंचाया है...

हालांकि चुनावों के दौरान नेताओं का दल बदलने का फॉर्मूला पुराना है| लेकिन इस फॉर्मूले के जरिए कांग्रेस ने साल 2018 के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की है| कांग्रेस को उम्मीद है कि इस फॉर्मूले के जरिए पार्टी लोकसभा मे बेहतर प्रदर्शन करेगी|

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