MP चुनाव : पहली बार इस हाईप्रोफाइल सीट पर गुरु-शिष्य में मुकाबला, कांटे की टक्कर

भोपाल। विधानसभा चुनाव के मैदान में सभी पार्टियां जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही हैं। ऐसे में चुनाव से ठीक पहले भाजपा को भितरघात और अंतर्कलह का डर सताने लगा है। 230  विधानसभा क्षेत्रों में होशंगाबादा विधानसभा सीट पर भाजपा को बड़ा खतरा मंडराता हुआ दिखाई दे रहा है। यहां हाल ही में भाजपा से कांग्रेस में शामिल हुए सरताज सिंह ने पार्टी की मुश्किलें बढ़ा रखी हैं। चुंकी इस बार मुकाबला कांग्रेस के सरताज सिंह का बीजेपी से विधानसभा अध्यक्ष सीतासरन शर्मा के बीच है। हैरानी की बात तो ये है सीतासरन, सरताज सिंह को अपना राजनीतिक गुरु मानते है। ऐसे में चुनाव ने पहली बार गुरु-शिष्य को आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है।हालांकि ऊंट किस करवट बैठेगा ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। फिलहाल यह सीट सभी के लिए रोचक बनी हुई है। दोनों के बीच कांटे की टक्कर है| 

दरअसल, 15  साल से इस सीट पर भाजपा का दबदबा है। 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की डॉ. सीता शरण शर्मा ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने कांग्रेस के रवि किशोर जायसवाल को चुनाव में हराया था। वहीं 2008 के विधानसभा चुनाव के दौरान यहां से बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर गिरजा शंकर शर्मा चुनाव मैदान में थें, उन्होंने 2008 के विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के विजय दूबे(काकु भाई) को चुनावी मैदान में मात दी थी। इस बार सीतासरण पांचवी बार विधानसभा का चुनाव लड़ रहे वही भाजपा से नाराज होकर कांग्रेस में शामिल हुए पांच बार सांसद, एक बार केंद्र में मंत्री और दो बार प्रदेश सरकार में मंत्री रहे सरताज सिंह मैदान में है। सालों बाद इस सीट पर समीकरण का बदलाव हुआ है। 

खास बात ये है कि विधानसभा अध्यक्ष डा. सीतासरन शर्मा के कारण यह सीट पहले से ही हाई प्रोफाइल थी। लेकिन सरताज सिंह के कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में आने के बाद यह सीट न केवल मध्यप्रदेश में बल्कि देश में चर्चा में आ गई। वह इसलिए नहीं कि सरताज सिंह केंद्रीय मंत्री रहे है, बल्कि इसलिए कि डा.सीतासरन शर्मा, सरताज सिंह को अपना राजनीतिक गुरू मानते हैं। अब मुकाबला गुरू और शिष्य के बीच है।


जातिय समीकरण

होशंगाबाद को ब्राह्मण बाहुल्य सीट माना जाता है. यहां दो लाख से अधिक मतदाताओं की संख्या है, जिनमें ब्राह्मणों की संख्या करीब 65 हजार के पास है। वहीं दूसरे नंबर पर यहां कुर्मी जाति का दबदबा है, जिनकी संख्या 50 हजार है, इसके अलावा, पिछड़ी जातियों की संख्या करीब 40 हजार के पास है। 


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