भारी बारिश से पशुपतिनाथ के आठों मुख जलमग्न, शिवना नदी ने किया जलाभिषेक

मंदसौर | मध्य प्रदेश में बारिश का दौर जारी है। भारी बारिश से कई जिलों में हालात बिगड़ गए हैं, वहीं मंदसौर में सीजन में दूसरी बार बाढ़ जैसे हालात बन गए हैं|  शिवना नदी उफान पर है और प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर तक पानी पहुँच गया है,  गुरुवार रात शिवना नदी ने भगवान पशुपतिनाथ के आठों मुखों का जलाभिषेक किया। शुक्रवार सुबह नदी का पानी कम होना शुरू हुआ है। 

मंदसौर में गुरुवार को भी सुबह से रिमझिम बारिश का सिलसिला जारी रहा। शहर में कॉलोनियों व निचले क्षेत्रो में अब पानी उतर गया है। शिवना नदी के कैचमेंट एरिये में हुई बरसात से नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ा, कालाभाटा बांध का तीसरा गेट खोलने के बाद फिर से पशुपतिनाथ मंदिर में पानी पहुच गया है। मंदिर में भरे पानी से अष्टमुखी मूर्ति पूरी पानी में डूब गयी है| मूर्ति के आंखों मुख को पानी ने अपने में समा लिया है| अब सिर्फ शिव का त्रिशूल दिखाई दे रहा है| 

पशुपतिनाथ मंदिर शिवना नदी के तट पर बसा है|  नदी उफान पर आने के कारण दो दिन पहले ही पानी मंदिर के गर्भगृह में आ गया था और मूर्ति के चार मुख जलमग्न हो गए थे|  आज मंदिर में इतना पानी भर गया कि पूरी मूर्ति जलमग्न हो गयी| भगवान पशुपतिनाथ के आठों मुख जलमग्न हो गए| 

यह है इतिहास 

अष्टमुखी पशुपतिनाथ की प्रतिमा का सौंदर्य अपने-आप में अनूठा है। नेपाल के पशुपतिनाथ में चार मुख की प्रतिमा है, जबकि मंदसौर में प्रतिमा अष्टमुखी है। माना जाता है कि प्रतिमा का निर्माण विक्रम संवत 575 ई. में सम्राट यशोधर्मन की हूणों पर विजय के आसपास का है। संभवत: मूर्तिभंजकों से रक्षा के लिए इसे शिवना नदी में दबा दिया गया था। अनुमान के अनुसार अज्ञात कलाकार ने प्रतिमा के ऊपर के चार मुख पूरी तरह बना दिए थे, जबकि नीचे के चार मुख निर्माणाधीन थे। पशुपतिनाथ की तुलना काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ से की जाती है। मंदसौर स्थित पशुपतिनाथ प्रतिमा अष्टमुखी है। जबकि नेपाल स्थित पशुपतिनाथ चारमुखी हैं। प्रतिमा में बाल्यावस्था, युवावस्था, अधेड़ावस्था व वृद्धावस्था के दर्शन होते हैं। इसमें चारों दिशाओं में एक के ऊपर एक दो शीर्ष हैं। प्रतिमा में गंगावतरण जैसी दिखाई देने वाली सफेद धारियां हैं। प्रतिमा को सबसे पहले स्व. उदाजी पुत्र कालू जी धोबी ने चिमन चिश्ती की दरगाह के सामने नदी के गर्भ में दबी अवस्था में देखा था। प्रतिमा को नदी से बाहर निकलने के बाद चैतन्य आश्रम के स्वामी प्रत्याक्षानंद महाराज ने 23 नवंबर 1961 को इसकी प्राण प्रतिष्ठा की। 27 नवंबर को मूर्ति का नामकरण पशुपतिनाथ कर दिया गया। इसके बाद मंदिर निर्माण हुआ। 19 जून 1940 को शिवना नदी से बाहर आने के बाद 21 साल तक भगवान पशुपतिनाथ की प्रतिमा नदी के तट पर ही रखी रही। 



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