सरदार सरोवर के पानी को लेकर फिर आमने-सामने मप्र-गुजरात, इनको होगा नुकसान

 भोपाल।

नर्मदा नदी पर गुजरात में बने सरदार सरोवर बांध के पानी को लेकर एक बार फिर एमपी व गुजरात सरकारे आमने-सामने आ गई है।मध्य प्रदेश के अफसरों ने प्राधिकरण पर गुजरात सरकार का पक्ष लेने का आरोप लगाया है।अफसरों का कहना है कि पुरानी बैठक के मिनट्स के संशोधन के बाद ही दूसरे एजेंडों पर चर्चा होनी चाहिए। वही इस मामले में नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण के अफसरों का कहना है कि मिनट्स जारी होने के 21 दिन के भीतर आपत्तियां व सुझाव दिए जा सकते हैं, लेकिन मप्र की तरफ से आपत्ति पेश नहीं की गई। हमने उन्हें 10 दिन का अतिरिक्त समय दिया है।

दरअसल, पिछले सप्ताह दिल्ली में बांध भरने के मामले बुलाई गई बैठक में भी मप्र के अफसर नहीं पहुंचे थे। प्राधिकरण के स्कीम-74 स्थित कार्यालय में जलाशय नियमन समिति की बैठक में मप्र के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान सरकार के अफसर शामिल हुए।इसके बाद गुरुवार को फिर से इंदौर में नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की बैठक बुलाई , जिसमें  मध्य प्रदेश के अफसरों ने प्राधिकरण पर गुजरात सरकार का पक्ष लेने का आरोप लगाया और बैठक छोड़कर चले आए। अधिकारियों ने बैठक का यह कहकर बहिष्कार कर दिया कि प्राधिकरण के अधिकारी एमपी के हितों से समझौता करते हुए सिर्फ गुजरात सरकार का पक्ष ले रहे हैं।  उन्होंने आपत्ति जताई कि डेढ़ साल पहले प्रदेश के हिस्से का पानी गुजरात सरकार ने ले लिया, लेकिन उसका समायोजन नहीं किया। बैठक छोडऩे के पहले  इसके अलावा नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण पानी की मात्रा तय करने में भी भेदभाव करता है।

एमपी में सरकार बदलने के बाद स्थिति बदली

बताया जाता है कि दो साल पहले दिल्ली में हुई एनसीए की बैठक में बांध को पूर्ण क्षमता से भरने का फैसला लिया गया था। केंद्र, गुजरात और मप्र में भाजपा की सरकार होने के टकराहट की कोई गुंजाइश नहीं थी, लेकिन बांध ही पूरी क्षमता से नहीं भर पाया। अब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है, यदि वह विरोधी रवैया नहीं अपनाती है तो डूब प्रभावित क्षेत्रों में नुकसान होगा।

1961 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने रखी थी नींव

इस बांध के निर्माण में काफी लंबा समय लगा। 1961 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहलाल नेहरू ने बांध की नींव रखी थी लेकिन बांध को लेकर संबंधित राज्यों के आपसी विवाद और डूब प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के विरोध के कारण बांध को बनने में 56 साल लगे। फिर कम बारिश के कारण बांध के पूर्ण क्षमता से नहीं भरने से अब तक उसका परीक्षण नहीं हो पाया।

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