VIDEO: 300 साल पुरानी परंपरा के नाम पर खूनी खेल, एक की मौत 400 से ज्यादा जख्मी

छिंदवाड़ा। विश्व प्रसिद्ध गोटमार मेले का आयोजन सोमवार अलसुबह से किया गया। 300  साल पुरानी परंपरा के नाम पर खेला जाने वाला ये खतरनाक खेल हर साल जानलेवा साबित होता है। प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार इस बार इस गोटमार खेल में 400 से ज्यादा लोग जख्मी हुए हैं, जबकि एक शख्स की मौत हो गई। 15 लोगों की हालत गंभीर बनी हुई है। वहीं कई लोगों की आंखें फूट गई हैं। लेकिन ये परंपरा जारी है। इस बार भी प्रशासन ने मेला परिसर में घायलों के लिए चार अस्थाई अस्पताल बनाएं हैं। 

बताया जा रहा है कि इस खूली खेल में 7 साल बाद किसी व्यक्ति की मौत हुई है। इससे पहले साल 2011 में भी एक शख्स की गंभीर घायल होने का बाद मौत हो गई थी। दोनों गाँवों के लोगों के बीच समझौता कर शान्तिपूर्ण तरीके से सोमवार शाम मेले का समापन हो गया है। इस मेले को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। यह गोटमार खेल सुबह से शाम तक खेला जाता है।

मेले के पीछे क्या है कहानी

विश्व प्रसिद्ध गोटमार मेले की परंपरा निभाने के पीछे किवदंतियां और कहानियां जुड़़ी हैं। किवदंती के अनुसार पांढुर्ना के युवक और सावरगांव की युवती के बीच प्रेम संबंध था। एक दिन प्रेमी युवक ने सांवरगांव पहुंचकर युवती को भगाकर पांढुर्ना लाना चाहा। जैसे ही दोनों जाम नदी के बीच पहुंचे तो सांवरगांव के लोगों को खबर लगी। प्रेमी युगल को रोकने के लिए पत्थर बरसाए, जिससे प्रेमी युगल की मौत हो गई। इस किवदंती को गोटमार मेला आयोजन से जोड़ा जाता है।

मराठी परिवार होते हैं शामिल

भाद्र के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि यानि पोला पर्व के दूसरे दिन छिंदवाड़ा ज़िले के पांढुर्णा में गोटमार मेला लगता है।  ये त्योहार महाराष्ट्रीयन परिवारों में मनाया जाता है। चूंकि पांढुर्णा गांव महाराष्ट्र से लगा हुआ है लिहाजा यहां की परंपराओं में मप्र और महाराष्ट्र का खासा प्रभाव रहता है। इस मेले में दोनों गांव के लोग एक दूसरे पर गोफन से पत्थरों की बरसात करते हैं। मराठी में पत्थर को गोटा कहा जाता है, इसलिए इसका नाम गोटमार मेला रखा गया है। 

बुथ अनुसार घायलों की संख्या निम्न प्रकार है-


1. सिविल अस्पताल पांढुर्ना 54

2. मारुति मंडल पांढुर्ना 72

3. सामुदायिक भवन पांढुर्ना 19

4. राजेन्द्र शाला सावरगांव 59

5. धर्मेंद्र बंसोड़ सावरगांव 23