हिंगोट युद्ध : वर्षो पुरानी परंपरा के लिए आज तुर्रा और कलंगी की जंग, बरसेंगे आग के गोले

इंदौर| सालों पुरानी परंपरा को निभाने के लिए आज दो  दो गांवों के ग्रामीणों के बीच हिंगोट युद्ध होगा| हर साल की तरह इस साल भी दीपावली के दूसरे दिन इंदौर से 55 किमी दूर गौतमपुरा में आज एक दूसरों पर आग के गोले बरसाए जाएंगे| इसमें हर साल कई लोग घायल होते हैं| जान की बाजी लगाकर भी लोग यह परंपरा निभाते हैं| इस युद्ध में किसी की हार या जीत नहीं होती| वही इस युद्ध को देखने के लिए भी हजारों की संख्या में लोग पहुँचते हैं| इस युद्ध के शुरू होने की तारीख का कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता है लेकिन दीपावली के अगले दिन पड़वा पर यहां के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी हिंगोट युद्ध का हिस्सा बनते चले आ रहे हैं। 

दरअसल, गौतमपुरा में वर्षों से हिंगोट युद्ध की परंपरा चली आ रही है. इस परंपरा के तहत दो-दो गांवों के लोग एक-दूसरे पर जमकर हिंगोट (बारूदी गोलों) बरसाते हैं|  इस युद्ध में शामिल होने वाले लोग पूरी तैयारी से पहुंचते हैं| जहां सुरक्षा के लिए हाथों में ढाल होती है तो सिर पर बड़ा से साफा (कपड़े की पगड़ी) बांधे रहते हैं. इसके बावजूद हर साल दर्जनों लोग हादसे का शिकार होकर घायल हो जाते हैं| दोपहर होते ही तुर्रा और कलंगी दल के योद्धा अपने सिर पर हेलमेट व साफा पहनकर एक कंधे पर झोला और हाथ में बचाव के लिए ढाल व जलती हुई लकड़ी को लेकर ढोल-ढमाके के साथ नाचते-गाते मैदान की ओर चल पड़ेंगे। परंपरा अनुसार देवनारायण मंदिर पहुंचकर दर्शन करेंगे और फिर मैदान पर एकत्रित होंगे। दोनों दल के योद्धा आमने-सामने खड़े होकर सूर्यास्त का इंतजार करेंगे। संकेत मिलते ही एक-दूसरे पर जलते हुए हिंगोट बरसाना शुरू कर देंगे। करीब एक घंटे तक यह खतरनाक खेल चलता है।


पिछले साल हुई थी एक की मौत, और दर्जनों घायल 

गौतमपुरा के योद्धाओं के दल को तुर्रा नाम दिया जाता है, जबकि रुणजी गांव के लड़ाके कलंगी दल की अगुवाई करते हैं। दोनों दलों के योद्धा रिवायती जंग के दौरान एक-दूसरे पर हिंगोट दागते हैं। इस जंग में हर साल कई लोग घायल होते हैं। माना जाता है कि प्रशासन हिंगोट युद्ध पर इसलिए पाबंदी नहीं लगा पा रहा है, क्योंकि इससे क्षेत्रीय लोगों की धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं। पिछले साल ही इस युद्ध में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और करीब तीन दर्जन से अधिक लोग घायल हुए थे, इनमे से कुछ गंभीर घायल हुए थे| 


ऐसे बनता है 'हिंगोट' 

हिंगोट हिंगोरिया नामक पेड़ पर पैदा होने वाला एक फल है। जो नींबू के आकारनुमा होकर ऊपर से नारियल समान कठोर तथा अंदर से खोखला होता है, जिसे योद्धा जंगल पहुंचकर पेड़ से तोड़कर लाते हैं।  इसे ऊपर से साफ कर भीतर से उसका गुदा निकाल दिया जाता है। इसके बाद सूखने के लिए धूप में रख दिया जाता है। इसमें एक ओर बड़ा छेद कर उसे बारूद से भरकर पीली मिट्‌टी से मुहं बंद कर दिया जाता है।  और बारीक छेद पर बारूद की बत्ती लगा देते हैं। जिस पर अग्नि को छुआते ही हिंगोट जल उठता है।  यह कार्य एक माह पहले से शुरू हो जाता है। दीपावली के अगले दिन पड़वा को यह जोखिम भरा हिंगोट युद्ध दो दल क्रमश: तुर्रा (गौतमपुरा) तथा कलंगी (रुणजी) के बीच होगा। दुस्साहसी योद्धा शाम होते ही एक-दूसरे पर हिंगोट बरसाना शुरू कर देंगे।