तीसरा मोर्चा उड़ाएगा सबके होश, 17 फीसदी वोट बैंक का होगा बिखराव

भोपाल। मध्यप्रदेश में बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए कांग्रेस ने महागठबंधन करने की याजना बनाई थी। लेकिन वह सपा, बसपा गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के साथ इस काम को अंजाम देने में नाकाम रही। कांग्रेस चाहती थी कि इस बार चुनाव में वोटों का बिखराव न हो। इसके लिए गठबंधन होना जरूरी है। लेकिन ऐसा नहीं होने से उसे चुनाव में भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। गठबंध असफल होने से 17 फीसदी वोटबैंक का बिखराव हो जाएगा। 

तीसरे मोर्चा का इतिहास देखा जाए तो तस्वीर साफ हो जाएगी। असल में तीसरे मोर्चे के ये अलग अलग दल भले ही जीत हासिल करने में नाकाम हो जाएं लेकिन यह मुख्य राजनीतिक दलों के वोटबैंक में सेंध लगाने में कामयाब हो जाते हैं। इस चुनाव में सवाल ये है कि तीसरा मोर्चा किसे नुकसान पहुंचाएगा। भाजपा का दावा है कि ये सारे दल कांग्रेस के ही वोट बैंक में सेंध लगाएंगे।

वहीं, कांग्रेस नेताओं का कहा है कि इन दलों की मौजूदगी में उन्हें कोई नुकसान नहीं होने वाला है।  कुल मिलाकर देखा जाए तो ये दल उन 25-30 सीट पर जिताऊ प्रत्याशियों के लिए सिरदर्द बनेंगे, जहां हार-जीत का अंतर 5 हजार के नीचे होगा। 

मध्यप्रदेश - कुल मतदाता 5,03,94,086 (2018)

कुल सीट - 230

2013 में मात्र साढ़े आठ फीसदी वोट पाकर ली 4 सीट

पिछले चुनाव से पहले पूर्व मुख्यमंत्री उमाभारती की वापसी के बाद भाजश का भाजपा में विलय हो गया। 2013 में हुए चुनाव में जहां तीसरे मोर्चे के दलों को मात्र साढ़े आठ फीसदी वोट मिले, वहीं सीटें मात्र 4 की संख्या में सिमट गईं। इसमें कई सीटों पर नोटा ने खेल बिगाड़ा, जो लगभग दो फीसदी के आसपास रहा।

वर्ष 2013, मतदाता- 4,69,34,590

मत पड़े- 3,32,06,406 (70.8%)

नोटा- 6,43,144 (1.9%)

सामान्य- 148, एससी- 35, एसटी- 47 (सीटें मिलीं)

भाजपा- 165 सीटें (45.7% वोट)

कांग्रेस- 58 सीटें (37.1% वोट)

बसपा- 4 सीटें (6.4% वोट)

सपा- 0 सीट (1.2% वोट)

गोंगपा- 0 सीट (1.0% वोट)

सामान्य-दलित विवाद का असर पड़ेगा

2018 में होने वाले चुनाव में एक बार फिर तीसरे मोर्चे के दल कई सीटों पर खेल बिगाड़ेंगे। इस बार सामान्य और पिछड़े वर्ग के संगठन सपाक्स, आदिवासियों का संगठन 'जयस" भी मैदान में हैं। बसपा, सपा और गोंडवाना भी वोटों का खेल बिगाड़ने को तैयार हैं। राजनीतिक पंडित भी अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं कि इन दलों की मौजूदगी से ज्यादा नुकसान किस दल को होगा।