प्रदेश अध्यक्ष पद के बहाने राज्य सभा के लिए जारी 'जंग'

भोपाल। मध्य प्रदेश में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष को लेकर लंबे समय से युद्ध चल रहा है। मामला दिल्ली तक पहुंच चुका है। धड़ों में बटी कांग्रेस नए अध्यक्ष के लिए के लिए संघर्ष करती दिख रही है। वहीं, इससे बड़ी लड़ाई है राज्य सभा पहुंचने की। प्रदेश में पीसीसी चीफ के अलावा कांग्रेस दिग्गज नेताओंं की आंख राज्य सभा जाने पर लगी है। अगले साल राज्य सभा सीट के लिए चुनाव होने हैं। ऐसे में सभी गुटों के नेता इस रेस के लिए अभी से तैयारी करना चाहते हैं। हाल ही के घटनाक्रमों से पार्टी की छवि काफी खराब हुई है। पार्टी नेतृत्व ने इस मुद्दे को वरिष्ठ नेता एके एंटनी की अध्यक्षता वाली अनुशासन समिति को भेज दिया।

यह फैसला सात सितंबर को मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कांग्रेस की आंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कर प्रदेश के सियासी घमासान से अवगत करवाया था। जिसके बाद उन्होंन यह फैसाल लिया। विधानसभा चुनाव से पहले नाथ प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए थे। सरकार बनाने में कामयाब हुई कांग्रेस को मुख्यमंत्री भी कमलनाथ ही मिले। वह दो पदों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उन्होंने हाईकमान से प्रदेश अध्यक्ष का पद छोड़ने के लिए कहा था। उनका कहना था कि वह दो पदोंं पर एक साथ रहकर प्रदेश की जिम्मेदारी सही तरह से नहीं सभंला पा रहे हैं। इसलिए संगठन के लिए मुखिया किसी और को बनाया जाए। 

फिर प्रदेश अध्यक्ष के नाम को लेकर कांग्रेस में युद्ध छिड़ गया। सभी गुट अपने अपने नेताओं के नाम आगे करने लगे। इस बीच ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम भी तेजी से आगे आया है। उनके समर्थकों ने उग्र प्रदर्शन भी किया। जिसके बाद सोनिया गांधी ने उन्हे दिल्ली भी तलब किया है। हालांकि, फिलहाल उनकी मुलाकात अभी सोनिया से नहीं हुई है। लेकिन कांग्रेस के अन्य गुट नहीं चाहते कि सिंधिया प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाए। यही कारण है कि सिंधिया के नाम पर देरी हो रही है। इसके अलावा हाईकमान भी नहीं चाहता है कि प्रदेश में पावर के दो केंद्र हों। सिंधिया खुद बड़े नेता हैं और ऐसे में मुख्यमंत्री कमलनाथ के होतो हुए प्रदेश में दो पावर के केंद्र बन जाएंगे। जिससे टकराव की स्थिति भी बन सकती है। नवंबर में सिंधिया का नाम मुख्यमंत्री के लिए चला। लेकिन बाज़ी कमलनाथ ने मारी। सिंधिया के बुरे दिन यहीं नहीं थमे गुना शिवपुरी लोकसभी सीट भी वह हार गए। यह उनकी पारंपरिक सीट थी। लेकिन जनता में गहरी नाराजगी की वजह से सिंधिया का बड़ा झटका लगा। 

सूत्रों के मुताबिक मध्य प्रदेश में अब प्रदेश अध्यक्ष पद की रेस से कही ज्यादा राज्य सभा सीट को लेकर दंगल होने वाला है। यह बात तय है कि जो प्रदेश अध्यक्ष बनेगा पार्टी फिर उसको राज्य सभा नहीं भेजेगी। अगले साल तीन राज्य सभा सीटें खाली होने वाली हैं इनमें से कांग्रेस दो सीटों पर अपनी निगाहें बनाए हुए है। इनमें से अक सीट एमपी के लिए तय मानी जा रही है। हालांकि, कहा जा रहा है कांग्रेस दूसरी सीट भी पाने में कामयाब हो सकती है। वर्तमान में कांग्रेस के पास 121 सीटें हैं। इनमें कुछ अन्य दलों की सीटें भी शामिल हैं। राजनीतिक के जानकारों का कहना है कि पीसीसी चीफ की लड़ाई तो सिर्फ दिखावा है असल जंग राज्य सभा पहुंचने की है। अलगे साल जनवरी या फरवरी में राज्य सभा सीट खाली होगी। जिसे के लिए कांग्रेस के दिग्गज अपने अपने दांव लगा रहे हैं। कांग्रेस शासन के दौरान, मध्य प्रदेश में एक मजबूत मुख्यमंत्री और एक कमज़ोर पार्टी प्रमुख को चुनने का पैटर्न रहा है। उदाहरण के लिए, दिग्विजय के कार्यकाल में, छत्तीसगढ़ के पारस राम भारद्वाज, राधा कृष्ण मालवीय और उर्मिला सिंह राज्य पार्टी प्रमुख रहे हैं। प्रदेश के चमकते नेताओं में मुख्यमंत्री ही होता है। ऐसे में कोई भी नहीं चाहेगा कि उनको टक्कर देने वाला पार्टी अध्यक्ष बने। इसलिए कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर जंग जारी है। 

सूत्रों के मुताबिक अगर सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया जाता है तो पार्टी उन्हें अलगे साल राज्य सभा में भेजने पर विचार कर सकती है। वर्तमान में प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में कमलनाथ के करीबी बाला बच्चन का नाम चल रहा है। उनके अलावा पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह, उमंग सिंघार, रामनिवास रावत जैसे दिग्गज नेताओं का भी नाम शामिल है। 

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