सरकार भूली अपना वादा, 2 साल बाद भी जारी ना हो सका कुपोषण पर श्ववेतपत्र

जबलपुर।

मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने आज से करीब दो साल पहले, सितंबर 2016 में कुपोषण पर श्वेतपत्र जारी करने का वादा किया था। पर सरकार वादा करके भूल गई और प्रदेश में कुपोषण, मासूमों पर काल बनकर बदस्तूर टूट रहा है। जानकर हैरानी होगी कि सुशासन के दावों वाले मध्यप्रदेश में रोज़ 61 बच्चों मौत हो रही है।जब खुद सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में कुपोषण से पीड़ित बच्चों की तादात 13 लाख पहुंच गई है तो इस चुनावी साल में कुपोषण और मासूमों की मौतों पर सियासत तेज हो गई है।

प्रदेश में पोषण आहार और मिड डे मील योजना पर करोडों रुपये खर्च करने के बाद भी कुपोषण का कलंक मिटने का नाम नहीं ले रहा। करीब दो साल पहले, 14 सितंबर 2016 को कुपोषण पर श्वेत पत्र जारी करने का वादा करने वाली राज्य सरकार अब तक श्वेतपत्र तो जारी नहीं कर सकी लेकिन इससे पहले एक बार फिर खुद सरकारी आंकड़ों ने प्रदेश में कुपोषण के गंभीर हाल उजागर कर दिए हैं... प्रदेश के महिला एवं बाल विकास विभाग के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में रोज़ 61 बच्चों की मौत हो रही है यानि हर घण्टे में दो से ज्यादा बच्चे ज़िंदगी की जंग हार रहे हैं।


जी हाँ, मध्यप्रदेश विधानसभा के हालिया मानसून सत्र में महिला एवं बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनिस ने यही जवाब दिया है... कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत के सवाल के जवाब में मंत्री ने सदन में जो जानकारी पेश की वो चौंकाने वाली है... जानकारी के मुताबिक मध्यप्रदेश में बीती फरवरी से मई के बीच, चार माह में कुल 7 हजार 332 बच्चों की मौत हो गई.. यानि हर दिन 61 बच्चों की मौत हुई.. इनमें शून्य से एक साल के 6 हजार 24 और एक से पांच साल के 1 हजार 308 बच्चे शामिल थे। विभागीय रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में 13 लाख बच्चे कुपोषित हैं जिनमें एक लाख 3 हजार 83 बच्चे अति कम वजन के यानि गंभीर कुपोषित पाए गए.. जानकारी के मुताबिक कुपोषण के हाल सतना के हाल सबसे गंभीर हैं जहां 45 हजार 814 बच्चे कुपोषित पाए गए।

इसके बाद छतरपुर में 39 हजार 361, छिंदवाड़ा में 30 हजार 814, जबलपुर में 24 हजार 18, और सिंगरौली में 12 हजार 247 बच्चे कुपोषित पाए गए... इन आंकड़ों पर ज़िला प्रशासन के अधिकारी अपनी दलील दे रहे हैं। जबलपुर कलेक्टर छवि भारद्वाज का कहना है कि उनकी कोशिश शतप्रतिशत बच्चों को महिला एवं बाल विकास विभाग के सर्वे में शामिल करने की होती है जिससे रजिस्ट्रेशन बढ़ने पर कुपोषण से पीड़ित बच्चों की तादात भी बढ़ी हुई नज़र आई है.. हांलांकि कलेक्टर का दावा है कि बीते समय की तुलना में ज़िले में कुपोषण की स्थिति में सुधार हुआ है। इससे पहले महिला एवं बाल विकास विभाग ने अक्टूबर 2017 से जनवरी 2018 की रिपोर्ट भी जारी की थी जिसके मुताबिक प्रदेश में इन चार महीनों में 11 हज़ार 558 जबकि रोज़ाना 91 बच्चों की मौत हुई थी। विभाग की नई रिपोर्ट में बच्चों की मौत का आंकड़ा रोज़ाना 91 से 61 बच्चों पर आ गया लेकिन क्या बच्चों की मौत होना वाजिब है। इस बीच जब शिवराज सरकार कुपोषण पर श्वेतपत्र लाने का वादा दो साल बाद भी नहीं निभा पाई हैय़

ऐसा नहीं है कि कुपोषण के आंकड़ों से मध्यप्रदेश पहली बार बदनाम हो रहा हो लेकिन समस्या ये भी है कि सरकार इन आंकड़ों को शर्मिंदगी का सबब नहीं मानती। इससे पहले भी लगातार कुपोषित बच्चों की मौतों के बाद सरकार ने कुपोषण पर श्वेतपत्र जारी करने का वादा तो किया लेकिन 2 साल बाद भी ना तो श्वेत पत्र आया और ना ही कुपोषण से लड़ने की सरकारी रणनीति का कोई ठौर-ठिकाना दिखता है। फिर भी देखना होगा कि नए चुनावों में जाने से पहले सरकार, कुपोषण पर श्वेतपत्र लाने और मासूमों को बचाने के वादे निभा पाती है या नहीं।