ग्राउंड रिपोर्ट: मंदसौर-नीमच की इन पांच सिटों पर भाजपा को खतरा

नीमच। श्याम जाटव।

मंदसौर-नीमच संसदीय क्षेत्र में भाजपा की हालत साढ़े14 बरस में  बद बदत्तर होती जा रही है। वर्ष 2003 में भाजपा ने आठ ही विधानसभा पर परचम लहराया था। वहीं 2008 में 3 सीट कांग्रेस ने भाजपा से छीनी थी और 2013 में भाजपा के पास 7 व कांग्रेस ने मात्र 1 सीट पर जीत दर्ज कर पाई।  गत वर्षो में भाजपा की हालत संसदीय क्षेत्र में खराब होती जा रही है। शिवराजसिंह चौहान चाहे अपनी पीठ कितनी ठोके और विकास का राग अलापे। लेकिन स्थानीय स्तर विधायक तक हार की कगार पर खड़े है।

-गोपनीय सर्वे का खुलासा

सूत्रों की माने तो संभाग में 29 में से संसदीय क्षेत्र की आठ सीटो में से 5 पर भाजपा की हालत पतली है। ये पार्टी स्तर या इंटलीजेंसी की रिपोर्ट की माने या प्रशासनिक स्तर की। सर्वे में सबसे ज्यादा हालत पतली नीमच जिले की जावद व नीमच की है। मंदसौर जिले की मल्हारगढ़, मंदसौर व भानपुरा सीट पर खतरा मंडरा रहा है। अब कांग्रेस को यहां पर दमदारी से जोर लगाना पड़ेगा। साथ ही जीतने वाले प्रत्याशी तथा स्वच्छ छवि के उम्मीदवार को टिकट दिया तो कांग्रेस के खाते में सभी सीटें छटक सकती है। ये एक विधानसभा का मामला नहीं है सभी आठ विधानसभा सीट का है।

मप्र में जनसंघ व भाजपा की राजनीति के उत्थान में संसदीय क्षेत्र की अहम भूमिका रही है। जिले के दो वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री रहे  है। एक नेता केंद्र में कैबिनेट मंत्री भी रहे है। यहां के संसदीय क्षेत्र के तत्कालीन सांसद प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रह चुके है। यह जिला कभी भाजपा के पितृपुरूष स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे की कर्मभूमि व कार्यशाला रहा है। सुंदरलाल पटवा, वीरेंद्रकुमार सखलेचा, खुमानसिंह शिवाजी जैसे वरिष्ठ नेता ठाकरे के अनुयायी रहे है। जनसंघ के सांसद बैरिस्टर उमाशंकर त्रिवेदी संसदीय दल के नेता रहे है।
-क्यों भाजपा की हालत पतली

सबसे पहले नीमच विधानसभा की बात करते है। यहां से विधायक दिलीपसिंह परिहार है। यहां कानून व्यवस्था और विकास के नाम पर कोई ठोस नीति नहीे बनी। साथ ही वर्तमान में भाजपा के पास ऐसा कोई दमदार चेहरा नहीं है जो चमत्कार दिखा सके। यही कारण है मंडी में भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार बुरी तरह हारे। जिसका मलाल कार्यकर्ताओं को आज तक है। किसान आंदोलन के बाद विधायक परिहार के खिलाफ लोगों में आक्रोश है। इसका उदाहरण राबडिय़ा में परिहार को किसान यात्रा के दौरान ग्रामीणों ने गांव में घुसने नहीं दिया।  

-सखलेचा ने किसी को मौका नहीं दिया

जावद विधायक ओमप्रकाश सखलेचा 15 साल से विधायक है। इन्होंने सामंशाही चलाते हुए भाजपा के आम कार्यकर्ताओ को क्षेत्र में अपने समकक्ष किसी को आगे बढऩे का मौका नही दिया। और यही कारण है कि कार्यकर्ता उनसे दूरी बनाने लगे है। विकास के नाम पर केवल जनता को छलने का काम किया। एक भी योजना धरातल पर आज तक नहीं आ पाई। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर जावद जैस कस्बे में स्वास्थ्य सेवाएं ठप पड़ी हुई है। ग्रामीण अंचल में बिजली व सडक़ का सपना बन गया है। आज भी आदिवासी बिजली व सडक़ के लिए बाटजोह रहे है। 

-दलितों से दूरी

मल्हारगढ़ से विधायक पूर्व जेल व परिवहन मंत्री जगदीश देवड़ा कांग्रेस उम्मीदवारद से बहुत कम वोटो से चुनाव जीते है। इस बार देवड़ा को टिकट मिला तो सीट निकालना कठिन होगा। लोगों का कहना है कि जिस वर्ग की वजह से टिकट मिला और मंत्री बने उसी वर्ग के लोगों से किनारा कर लिया। अब क्षेत्र के लोगों ने धारणा बना ली की इसका खामियाजा दिसंबर में होने वाले चुनाव में भुगतना पड़ेगा। यहां से देवड़ा को हराने के लिए कांग्रेस ने रणनीति तैयार कर ली।

-केवल बातें की है

मंदसौर विधायक यशपालसिंह सिसौदिया ने क्षेत्र में विकास की बातें की है और उन्हें मूर्तरूप देने में कोई रूचि नहीं दिखाई। कांग्रेस ने यहां पर 6 जून को राहुल गांधी के सफल कार्यक्रम के बाद उन्हें पटाखनी देने के लिए कमर कस ली है और तेलिया तालाब जमीन का जिन्न अभी तक उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है। यशपाल की 10 साल तक मप्र पंचायकर्मी सचिव संगठन के प्रदेश अध्यक्ष दिनेश शर्मा से उनकी पटरी नहीं बैठी  है। अब दिनेश अगामी चुनाव में इसका बदला लेंगे। एक पंचायत सचिव गांव में सत्ता पलट सकता है और यहीं काम  शर्मा कर सकते है।  वे 23 हजार पंचायत सचिवों के प्रदेशाध्यक्ष है। ऐसे में मंदसौर विधानसभा क्षेत्र की सभी पंचायतों पर परिणाम प्रभावित करने का मादा भी रखते है।

-संभाग से एक विधायक

सुवासरा विधानसभा से कांग्रेस के हरदीपसिंह डंग विधायक है। उज्जैन संभाग में कांग्रेस के पास केवल एक ही विधायक है। डंग 2013 में भाजपा के पूर्व विधायक राधेश्याम पाटीदार को हराया था। पाटीदार को राजनीति विरसात में मिली और उनके पिता नानालाल पाटीदार कई बार सीतामऊ से विधायक रहे है। भाजपा में उनकी पकड़ अच्छी रही है। लेकिन उनके पुत्र राधेश्याम जनता में अलग छवि नहीं बना पाए। भाजपा का एक खेमा उनसे काफी नाराज है। ऐसे हालात में दूसरी बार विधायक बनना उनके लिए सपना बनकर रह सकता है।