क्रिकेट की दुनिया में एक और उभरता सितारा, गोलगप्पे बेचकर किया सपना पूरा, 3 साल में लगाए 51 शतक

नई दिल्ली| क्रिकेट का खेल ऐसा जहां कइयों की किस्मत चमकी और आसमान की बुलंदियों तक पहुंचे और कई ऐसे भी रहे जिनकी नाम आज गुमनामी के अँधेरे में  है, देश की गली गली में हुनर छुपा है, जिन्हे सही मौक़ा मिले तो देश का नाम रोशन कर सकते हैं| ऐसे ही एक खिलाड़ी ने सबका दिल जीत लिया है| भारत को अंडर-19 एशिया कप दिलाने में ख़ास भूमिका दिलाने वाले यशस्वी जायसवाल का नाम देश भर में चर्चा में और उनके संघर्ष की कहानी सभी को प्रेरित कर रही है|  

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के रहने वाले यशस्वी के लिए भारतीय टीम में जगह बनाना मुश्किल सपना था। यहां तक पहुंचने के लिए उसे मुंबई शहर में गोल-गप्पे तक बेचने पड़े।  अंडर-19 टीम तक पहुंचने के लिए यशस्वी ने कई मुश्किलों का सामना किया है। यह उनकी कड़ी मेहनत और संघर्ष का ही नतीजा है कि आज सब उनके खेल की तारीफ कर रहे हैं। हाल ही में भारत की अंडर-19 क्रिकेट टीम ने श्री लंका टीम को 144 रन से हराकर रेकॉर्ड छठी बार एशिया कप अपने नाम कर लिया। फाइनल में भारतीय टीम को 304/3 के विशाल स्कोर तक पहुंचाने में यशस्वी जायसवाल ने 113 गेंदों में 85 रनों की अहम पारी खेली| साथ ही उन्होंने तीन मैचों में 214 रन बनाए जो टूर्नमेंट में किसी बल्लेबाज के सर्वाधिक रन हैं। 

तीन साल में 51 शतक, टीम इंडिया में जगह बनाने के काबिल 

कोच ज्वाला सिंह का दावा है कि बाएं हाथ के बल्लेबाज यशस्वी ने पिछले तीन साल में 51 शतक जमाए हैं और अपने लेग स्पिन के सहारे 300 से ज्यादा विकेट भी चटकाए हैं| ज्वाला सिंह ने यशस्वी जायसवाल को तब खेलते देखा था जब वह सिर्फ 11 या 12 साल के थे लेकिन उस वक्त यशस्वी बहुत सारी मुश्किलों से जूझ रहे थे। वह अच्छा खेलते थे लेकिन उनके पास कोई कोच नहीं था और मां-बाप भी साथ नहीं रहते थे। ज्वाला बताते हैं कि यशस्वी को बड़े रन बनाने की आदत है।  साथ ही उन्होंने बताया कि इस युवा प्रतिभाशाली खिलाड़ी के अंदर क्रिकेट की एक दीवानगी है। उनका मानना है कि यशस्वी इसी तरह बड़े टूर्नामेंटों में रन बनाता रहा, तो उसे टीम इंडिया में जगह बनाने से कोई नहीं रोक सकता.


आसान नहीं था सफर, गोल गप्पे भी बेचे 

यशस्वी का अब तक सफर आसान नहीं रहा, उन्हें कड़े संघर्ष और मुश्किल दौर से गुजरना पड़ा|  जब वह 2012 में क्रिकेट का सपना संजोए अपने चाचा के पास मुंबई पहुंचा, तो वह महज 11 साल का था. चाचा के पास इतना बड़ा घर नहीं था कि वह उसे भी उसमें रख सके, वह एक डेयरी दुकान में अपनी रातें गुजारता था| अपने जीवन के बारे में बात करते हुए यशस्वी ने बताया, 'मैं सिर्फ यही सोचकर आया था कि मुझे बस क्रिकेट खेलना है और वह भी सिर्फ और सिर्फ मुंबई से।' साथ ही यशस्वी बताते हैं कि जब आप एक टेंट में रहते हैं तो आपके पास बिजली, पानी, बाथरूम जैसी सुविधाएं भी नहीं होती। मुश्किल वक्त में यशस्वी ने अपना खर्च चलाने के लिए मुंबई के आजाद मैदान पर गोलगप्पे भी बेचे थे। इस बारे में वह बताते हैं कि मुझे गोलगप्पे बेचना अच्छा नहीं लगता था क्योंकि जिन लड़कों के साथ मैं क्रिकेट खेलता था, जो सुबह मेरी तारीफ करते थे, वही शाम को मेरे पास गोलगप्पे खाने आते थे। साथ ही उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा करने पर बहुत बुरा लगता था लेकिन उन्हें यह करना पड़ा क्योंकि उन्हें जरूरत थी। यशस्वी ने लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करवाया, जब उसने अंडर-14 के एक मैच में ऑलराउंड प्रदर्शन करते हुए पारी में नाबाद 319 रन बनाए और उस मैच में 13 विकेट भी चटकाए|