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रेपिस्ट को फांसी की सजा सुनाने के बाद जज ने पढ़ी कविता, भावुक हो उठे सब

झुंझुनू।

बच्ची से दुष्कर्म के आरोपी को सजा सुनाने के बाद एक महिला जज इस कदर भावुक हो उठी कि उन्होंने एक कविता पढ़ डाली। जज के कविता पढ़ते ही अदालत में मौजूद सभी लोग भावुक हो उठे और उनकी आंखे नम हो गई। कविता पढ़ने से पहले जज ने कहा कि जब ये सब सुन मेरा ही कलेजा फट तो उसकी मां कैसे सोई होगी। संभवत: देश के इतिहास में ये पहला मौका है, जब कोई जज दुष्कर्मी को फांसी की सजा सुनाने के बाद भावुक हुई हो और उन्होंने नम आंखो से कविता पढ़ी हो।

दरअसल,  घटना 2 अगस्त को झुंझुनू के डाबड़ीधीर सिंह नगांव में हुई थी। तीन साल की मासूम से विनोद बंजारा नाम के फेरीवाले ने दुष्कर्म किया था। दोषी विनोद फेरी लगाकर बर्तन बेचने का काम करता है। 2 अगस्त को वह डाबड़ी धीर सिंह गांव में पहुंचा था। यहां अपने ननिहाल आई तीन साल की मासूम को उसने घर में अकेला देख उसके साथ दुष्कर्म किया और भाग गया। पुलिस ने तीन अगस्त को चिड़ावा में किराए के मकान से रह रहे विनोद को पकड़ा और 11 दिन में ही आरोपी के खिलाफ चालान पेश कर दिया। आरोपी की ओर से किसी वकील ने पैरवी नहीं की तो सरकार ने विधिक सहायता के तहत उसे वकील मुहैया करवाया। चालान पेश होने के 19वें दिन शुक्रवार को विनोद को कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट में मृत्यु दंड की सजा सुना दी।हालांकि आरोपी को सजा सुनाने के बाद जज भावुक हो उठे और उन्होंने मासूम को लेकर एक कविता पढ़ी। कविता के पढ़ते ही अदालत में बैठे सभी लोग भावुक हो उठे।


जज नीरजा दाधीच की मार्मिक कविता- 

वो मासूम नाजुक बच्ची एक आंगन की कली थी, वह मां-बाप की आंख का तारा थी, अरमानों से पली थी। 

जिसकी मासूम अदाओं से मां-बाप का दिन बन जाता था, जिसकी एक मुस्कान के आगे पत्थर भी मोम बन जाता था। 

वह छोटी-सी बच्ची, ढंग से बोल नहीं पाती थी, दिखा के जिसकी मासूमियत, उदासी मुस्कान बन जाती थी। 

जिसने जीवन के केवल तीन बसंत ही देखे थे, उस पर यह अन्याय हुआ, यह कैसे विधि के लेखे थे। 

एक तीन साल की बेटी पर यह कैसा अत्याचार हुआ, एक बच्ची को दरिंदों से बचा नहीं सके, यह कैसा मुल्क लाचार हुआ। 

उस बच्ची पर जुल्म हुआ, वह कितनी रोई होगी, मेरा कलेजा फट जाता है तो मां कैसे सोई होगी। 

जिस मासूम को देखकर मन में प्यार उमड़ के आता है, देख उसी को मन में कुछ के हैवान उतर आता है। 

कपड़ों के कारण होते रेप जो कहें, उन्हें बतलाऊं मैं, आखिर तीन साल की बच्ची को साड़ी कैसे पहनाऊं। 

गर अब भी ना सुधरे तो एक दिन ऐसा आएगा, इस देश को बेटी देने से भगवान भी घबराएगा।


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