इस्राइल में 'लाल बछिया' का जन्म...कयामत की आशंका से उठते सवाल

भोपाल।

इधर अपने देश में गोरक्षा को लेकर लोग मारे जा रहे हैं, उधर इजराइल में रहस्यमयी लाल बछिया के जन्म के बाद दुनिया के अंत की आशंका से दहशत है। बताया जाता है कि यहूदियों के देश इस्राइल में इस लाल बछिया ( रेड हेफर) का अवतरण 2 हजार साल बाद हुआ है। यहूदियों और ईसाइयों की मान्यता है कि लाल बछिया के जन्मते ही दुनिया में परस्पर शत्रु सेनाएं आपस में भिड़ेंगी और अंतत: पूरे विश्व का सर्वनाश हो जाएगा। हालांकि इस्राइल के पवित्र धार्मिक शहर यरूशलम स्थित टेंपल इंस्टीट्यूट की अोर से कहा गया है कि नवजात बछिया का गहन परीक्षण किया जा रहा है। जांचा जा रहा है कि बछिया पूरी तरह लाल है या नहीं। इंस्टीट्यूट के मुताबिक ईश्वर ने देवदूत को बताया था कि पहली लाल गाय पैदा होते ही दुनिया सर्वनाश को प्राप्त होगी। खास बात यह है कि इस लाल बछिया के अवतरण की सूचना खुद टेंपल इंस्टीट्यूट नेयू ट्यूब पर की है। अगर इस ‘दैवी’ बछिया में कोई दोष नहीं पाया गया तो इंस्टीट्यूट घोषित करेगा कि दुनिया के समक्ष बाइबिल की सत्यता ( प्रामाणिकता) को एक बार फिर बहाल करने का वादा पूरा हो गया है।

उल्लेखनीय है कि ईसाइयों और यहूदियों में दुनिया के अंत से जुड़ी भविष्यवाणियों में लाल गाय सबसे अहम  चीज है। बाइबिल के मुताबिक धरती पर एक पूर्ण रूप से लाल बछिया के जन्म लेने का मतलब है कि यहूदी मसीहा का जन्म होने वाला है। इसी के बाद मनुष्य को अंतिम निर्णय का सामना करना पड़ेगा। जो व्यक्ति नैतिकता और भगवान में विश्वास करने वाला होगा, उसे अपना नाम ‘जीवन की किताब’में दर्ज कराने का अधिकार होगा। अर्थात वह जीवित रहेगा। जिसका नाम इस किताब में नहीं होगा, उसे आग के दरिया में फेंक दिया जाएगा। 

यहूदी विश्वास के अनुसार इस लाल बछिया की बलि देने के बाद यरूशलम स्थित टेंपल माउंट ( मंदिर पर्वत) पर तीसरे मंदिर का ‍निर्माण किया जा सकता है। यह टेंपल माउंट यरूशलम की अल अक्सा ‍मस्जिद के पास बताया जाता है। इस तरह का पहला मंदिर यरूशलम में 957 ईसा पूर्व यहूदी राजा सोलोमन ने बनवाया था, जिसे 586 ईसा पूर्व बेबीलोनवासियों ने हमला कर ध्वस्त कर दिया। इसके बाद दूसरा मंदिर नए सिरे से 586 ईसा पूर्व निर्मित हुआ, जिसे रोमनो ने 70 ईसवी सन में तोड़ दिया। वही अब तीसरे मंदिर को बनाने की बात कही जा रही है। टेंपल इंस्टीट्यूट ने इसकी तैयारी भी शुरू कर दी है। मगर शर्त यह है कि यह तीसरा मंदिर तभी बनेगा, जब माउंट  पर पहले से मौजूद सभी चीजों को ध्वस्त कर ‍दिया जाए। कट्टर यहूदी मानते हैं कि टेंपल दोबारा बना तो दुनिया में यहूदी मसीहा अवतरित होंगे। टेंपल इंस्टीट्यूट तीसरा मंदिर बनाने के लिए यहूदी विद्वानों अौर विशेषज्ञों की वो संस्था है, जो बाइबल में उल्लेखित यहूदी मंदिर के विवरण के मुताबिक ही तीसरा यहूदी मंदिर बनाने  के लिए प्रतिबद्ध है। 

 कहते हैं कि इसके पहले दो और लाल बछियाअों के जन्म का दावा‍ किया गया था। इनमें से पहली को इसलिए खारिज किया गया, क्योंकि वह बछिया न होकर बछड़ा था। दूसरे मामले में बछिया के शरीर पर सफेद बाल पाए गए थे। यहूदियों के धर्मग्रंथ तोराह में कहा गया है कि  लाल बछिया पुजारी के पास बलि के लिए लाई जाएगी। उसकी राख से मृतकों की अपवित्रता को पवित्रता में बदला जाएगा। 

तो क्या यहूदियों का बहुप्रतीक्षित तीसरा मंदिर सचमुच बनने वाला है? लाल बछिया के जन्म के बाद क्या दुनिया के आखिरी फैसले की घड़ी करीब आ गई है? अगर दुनिया खत्म ही होने वाली है तो हमारी गायों का क्या होगा, जिनको बचाने के लिए हम जी जान लगाए हुए हैं? यहूदी और ईसाई अगर इसमें दुनिया का अंत देख रहे हैं तो हमारी और गैर यहूदी और गैर ईसाई दुनिया कहां रहेगी? वो लाल बछिया की भी बलि देना चाहते हैं, लेकिन हमारे लिए तो पूरा गोवंश ही पवित्र और पूजनीय है। क्या इनका भी आपस में कोई सम्बन्ध है या फिर यह केवल अलग अलग आस्थाअो  और मान्यताअो का मामला जिसका दुनिया के व्यावहारिक पहलुअों से कोई खास लेना देना नहीं हैं। जो जहां रह रहा है, अपनी अास्थाअों के साथ जीता रहेगा। सवाल यह भी है कि यदि दुनिया का अंत ही होना है तो तीसरा मंदिर बनाने का क्या महत्व है?  लेकिन इन सवालों से इतना घबराने या चिंतित होने की जरूरत नहीं है। जैसी हमारी धार्मिक और पौराणिक आस्थाएं हैं, वैसी ही दूसरे धर्मों को मानने वालों की भी हैं। 

हर धर्म की अपनी पवित्र ‍िकताबें हैं, जिनमें मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति और सात्विक आचरण के नियम और कर्तव्यों का अपने ढंग से ‍िजक्र है। उस धर्म के अनुयायियों से उनका कड़ाई से पालन अपेक्षित है। जहां यहूदी धर्म का सवाल है, यह इब्राहिमी धर्मों में सबसे पुराना है। इसकी पुरातनता हिंदू धर्म के समकक्ष मानी जा सकती है। यहूदी मूसा को मानते हैं और आज तक अपनी जमीन के लिए लड़ रहे हैं। इस्राइल का जन्म उनके इसी ‍िचर स्वप्न को साकार करने का एक ठोस कदम था। वैसे भी यरूशलम विश्व का वो पवित्रतम शहर है, जिससे यहूदियों, मुसलमानों और ईसाइयों की आस्थाएं समान रूप से जुड़ी हुई है और इस पर कब्जे को लेकर इतिहास में कई लड़ाइयां लड़ी गई। आज भी इस पर विवाद है। 

यहूदी मानते हैं कि लाल बछिया का जन्म इस बात का प्रतीक है कि यरूशलम में उनकी तीसरा धार्मिक मंदिर बनेगा।  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कुछ माह पहले यरूशलम को इस्राइल की राजधानी घोषित करने का जो ‘क्रांतिकारी’ ऐलान किया गया था, उसके बाद लाल बछिया के जन्म लेने की खबर नई  वैश्विक राजनीति, ध्रुवीकरण और सैन्य तनावों का कारण बन सकता है। क्योंकि ज्यादातर अरब देश और कुछ अन्य देश भी यरूशलम को इस्राइल की राजधानी बनाने से सहमत नहीं हैं। रहा सवाल भारत का तो मोदी सरकार के रहते इस्राइल से हमारे सम्बन्ध  पहले की तुलना में काफी मजबूत हुए हैं। 

अगर टेंपल माउंट पर तीसरा यहूदी मंदिर बना तो नया वैश्विक तनाव फैल सकता है। तब क्या यहूदियों की लाल बछिया के प्रति आस्था और हिंदुअों की गौ आस्था के बीच कोई अंतर्सम्बन्ध बनेगा? इस बारे में अभी केवल कल्पना भर की जा सकती है। दोनो संस्कृतियों में एक समान सूत्र जरूर खोजा जा सकता है और वो है मंदिर बनाने का। यहूदी तीसरा मंदिर बनाने की चिर आंकाक्षा पाले हुए हैं तो भारत में हिंदू अपने मर्यादा पुरूषोत्तम का मंदिर बनाने की हसरत में राजनीतिक  प्रयोग भी ‍किए जा रहे हैं। यह धार्मिक और पौराणिक संदर्भों में इतिहास को ‘ठीक’ करने की सामूहिक चेतना भी है। अतीत में की गई ‘भविष्यवाणियां’ हमे जीने का मकसद और ऊर्जा तो देती हैं, लेकिन वो क्या सचमुच में पूरी भी होती हैं, यह बताना आसान नहीं है। इससे भी बड़ा सवाल  यह है कि ऐसी भविष्यवाणियां या ‘इतिहास की दुरूस्ती’ किस कीमत पर साकार होंगी? क्या उसकी कीमत समूची मानव सभ्यता का विनाश है, जैसे कि लाल बछिया के बारे में कहा जा रहा है? 

( लेखक ‘सुबह सवेरे’ अखबार के वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल है)