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ये है MP के खास डेस्टिनेशन.. जहां कर सकते है आप NEW YEAR CELEBRATION


डेस्क।

नए साल आने में सिर्फ एक दिन बचा है।नए साल को लेकर सभी बहुत उत्साहित है।ऐसे में हर किसी ने अपने नए साल को मनाने की काफी प्लानिंग की होगी। लेकिन कुछ लोग जिन्होंने अभी तक प्लान नही किया है कि कहां जाए। तो हम आपकी इस टेंशन को दूर कर देते है। आज हम आपको मध्यप्रदेश के ऐसे पर्यटन स्थलों से वाकिब कराने जा रहे है, जहां आप नये साल को अपनी फैमिली या फ्रेंड्स के साथ सेलिब्रेट कर सकते है, और नए साल की नई यादें संजो सकते है। मप्र के आसपास की कुछ ऐसी जगह जहां आप अपने नए साल को शानदार बना सकते है।

भोपाल-

भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी तो है ही साथ ही यह झीलों की नगरी का खिलाब भी जीते हुए है।  भोपाल की जुडवां झीलों के बारे में किवदन्ती है कि यह रानी कमल के आकार की नाव में इन झीलों में सैर किया करती थी। ये झीलें आज भी शहर का केन्द्र हैं।

भोपाल पुरातन और नवीन का एक सुन्दर मिश्रण है। पुराने शहर में स्थित पुराने बाजार, मस्जिदें और महल आज भी उस काल के शासकों के भव्य अतीत की याद दिलाते हैं। सुन्दर पार्क और गार्डन, लम्बी चौडी सडक़ें, आधुनिक इमारतों के कारण आधुनिक भोपाल भी बड़ा प्रभावशाली है। ताज उल मस्जिद, जामा मस्जिद, मोती मस्जिद, शौकत महल, सदर मंजिल, गौहर महल, भारत भवन, स्टेट म्यूजियम, गाँधी भवन, वन विहार और लक्ष्मी नारायण मन्दिर। अपर और लोअर लेक तथा मछली घर भी दर्शनीय हैं।



सांची -

सांची भोपाल से 46 किमी की दूरी पर है। सांची अपने स्तूपों और बौध्द स्थानकों तथा उन स्तम्भों के लिये प्रसिध्द है । सांची का प्रसिध्द स्तूप मौर्य सम्राट अशोक ने बनवाया था। अशोक ने बौध्द धर्म को प्रश्रय दिया और इसके प्रचार प्रसार हेतु अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को सिंहल द्वीप (श्री लंका) भेजा। प्रथम स्तूप के निकट एक स्तम्भ है सेन्डस्टोन का जो मौर्य युगीन चमक से आज भी चमकता है, उस पर स्पष्ट शब्दों में बौध्द धर्म के नियमों को लिखा है। यह स्तूप भारत की सबसे पुरानी पत्थर की इमारत है।

सांची पहाडी ख़ण्डों में बँटी है। सबसे नीचे के खण्ड में दूसरा स्तूप स्थित है जबकि पहला और तीसरा स्तूप और पाँचवी शती में निर्मित गुप्त कालीन मंदिर न17 और सातवीं शती में निर्मित मन्दिर न 18 बीच के हिस्से में स्थित हैं और बाद में बनी बौध्द मॉनेस्ट्री शिखर पर स्थित है। दूसरा स्तूप बौध्दकालीन मूर्तिकला का प्रतिनिधित्व करता है, इसमें बुध्द के जीवन और उस काल की प्रमुखा घटनाओं पर आधारित कलाकारी की गई है। इन स्तूपों के प्रवेश द्वार देखने योग्य हैं। दर्शनीय स्थलों में स्तूप प्रथम, चार प्रवेश द्वार, स्तूप द्वितीय, स्तूप तृतीय, अशोक स्तम्भ, बौध्द विहार, विशाल पात्र, गुप्त कालीन मन्दिर और संग्रहालय प्रमुख हैं।



भीमबेटका

भीमबेटका विन्ध्याचल पहाडियों के उत्तरीय छोर पर स्थित भोपाल से 35  किमी दूर एक गाँव है। यह स्थान बडी-बडी चट्टानों से घिरा है। हाल ही में इन चट्टानों में बने पूर्व पाषाण युग की गुफाओं में बने हुए छह सौ से भी ज्यादार् भित्तिचित्रों का पता चला है। संसार में अब तक पाये जाने वाले पूर्व पाषाण युगीनर् भित्तिचित्रों का सबसे बड़ा संग्रह इन्हीं गुफाओं में है। मध्यप्रदेश में पर्यटन की संभावनाएं अथाह हैं, अब भी बहुत कुछ ऐसा है जो इस सीमित लेख के दायरों में नहीं समा पा रहा। इस सत्य का अनुभव आप यहाँआकर ही कर सकते हैं, अनेकों अनछुए, अव्यवसायिक पर्यटन स्थल हैं जिन्हें खोज आप रोमांचित हो सकते हैं।


भोजपुर

यह प्राचीन शहर दक्षिण पूर्व भोपाल से 28 किमी की दूरी पर स्थित है। यह शहर भगवान शिव को समर्पित भोजेश्‍वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर को पूर्व का सोमनाथ भी कहा जाता है। मंदिर की सबसे खास विशेषता यहां के लिंगम का विशाल आकार है। लिंगम की ऊंचाई लगभग 2.3 मीटर की है और इसकी परिधि 5.3 मीटर है। यह मंदिर 11 वीं शताब्‍दी में राजा भोज ने बनवाया था। शिव रात्रि का पर्व यहां बडी धूमधाम से मनाया जाता है। मंदिर के निकट ही एक जैन मंदिर भी है जिसमें एक जैन तीर्थंकर की 6 मीटर ऊंची काले रंग की प्रतिमा स्‍थापित है।



रायसेन का किला

यह किला भोपाल से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित है। कहा जाता है कि इस किले में पारस पत्थर है, जिसकी रखवाली जिन्न करते हैं।1200 ईस्वी में निर्मित यह किला रायसेन, मध्य प्रदेश का एक प्रमुख आकर्षण है। पहाड़ी की चोटी पर इस किले के निर्माण के बाद रायसेन को इसकी पहचान बलुआ पत्थर से बना हुआ ये किला प्राचीन वास्तुकला एवं गुणवत्ता का एक अद्भुत प्रमाण है जो इतनी शताब्दियां बीत जाने पर भी शान से खड़ा हुआ है। इसी किले में दुनिया का सबसे पुराना वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम है। इस किले पर शेरशाह सूरी ने भी शासन किया था। कहा जाता है यहां के राजा के पास पारस पत्थर था, जिसे किसी भी चीज को छुलाभर देने से वह सोना (GOLD) हो जाती थी। कहा जाता है कि इसी पारस पत्थर के लिए कई युद्ध भी हुए, जब यहां के राजा राजसेन हार गए तो उन्होंने पारस पत्थर को किले पर ही स्थित एक तालाब में फेंक दिया।



ओरछा का किला

ओरछा की नींव सोलहवीं शताब्दी में बुन्देल राजपूत राजा रुद्रप्रताप द्वारा रखी गई।  ओरछा एक देखने योग्य स्थान है और ग्वालियर से 119 कि मि की दूरी पर है।दतिया दिल्ली मद्रास मार्ग पर स्थित है। बेतवा नदी के किनारे बसी यह जगह बुंदेलों की राजधानी रही है। यहां का मशहूर ओरछा किला वास्तुकला का एक अद्भुत उदहारण है। यहां चतुरभुज मंदिर, राज महल, राम राजा मंदिर और लक्ष्मीनारायण मंदिर देखने लायक हैं.दतिया का महत्व महाभारत काल से जुडा है। राजा बीर सिंह जी देव द्वारा विकसित इस क्षैत्र में उनके बनवाए कुछ ऐतिहासिक महल और मन्दिर हैं। यहां के देखने योग्य स्थान र्हैं कोषाक महल, बादल महल गेट, जामा मस्ज्दि, शहजादी का रोजा, परमेश्वर ताल आदि। वैसे चन्देरी का महत्व एक प्रमुख शिल्प कला केन्द्र के रूप में अधिक है, यहां की चन्देरी साडी और ब्रोकेड विश्वभर में प्रसिध्द है।



उज्जैन-

यह मध्य प्रदेश का एक प्रमुख शहर है जो क्षिप्रा नदी के किनारे बसा है। यह एक बहुत प्राचीन नगरी है। उज्जैन राज विक्रमादित्य की राजधानी थी। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकाल इस नगरी में है। यहां हरसिद्ध‍ि मंदिर, श्री बड़े गणेश मंदिर, भर्तृहरि गुफा, काल भैरव मंदिर और क्षिप्रा घाट घूमने लायक है।


पंचमढ़ी-

 सतपूड़ा पर्वतमालाओं के बीच घिरा यह हिल स्टेशन अपने दामन में बेहद खूबसूरती समेंटे है. इसे सतपूड़ा की रानी भी कहा जाता है। यहां प्रियदर्शिनी प्‍वाइंट, बी फॉल, हांडी खोह, पांडव गुफा, अप्सरा विहार, जटाशंकर गुफा और राजेंद्र गिरि घूमने लायक जगह हैं।


बांधवगढ़-

मध्य भारत के दिल में बसे विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बांधवगढ़ नेशनल पार्क में देश के सबसे ज्यादा बाघ हैं। यहां पर हाथी सफारी का भी लुत्फ लिया जा सकता है।


जबलपुर-

यहां की मनमोहक प्राकृतिक सुंदरता लोगों को बहुत लुभाती है। दुनिया में जबलपुर मार्बलरॉक्स के लिए जाना जाता है। जो कि यहां से 23 किमी. दूर भेड़ाघाट में हैं। नर्मदा नदी के दोनों ओर दूर तक  ऊंची संगमरमर की चट्टानें बहुत सुंदर दिखती हैं। यहां बोटिंग की सुविधा नवंबर से मई तक होती है। यहां धुंआधार फाल्स भी बेहतरीन जगह है।



ग्वालियर-

भारतीय इतिहास का गौरवशाली पन्ना ग्वालियर के किलों और महलों में जिंदा हो उठता है. यह शहर कई लड़ाइयों, रक्तपात और मौतों का गवाह रहा है. यहां घूमने की जगह हैं- ग्वालियर का किला, मानमंदिर महल, जयविलास महल व म्यूजियम, सरोद घर, तानसेन स्मारक और सूर्य मंदिर.



मांडू-

 यह इंदौर से 99 किमी. दूर है। मांडू विंध्य की पहाड़ियों में 2000 फीट की ऊंचाई पर है। यह जगह कवि व राजा बाजबहादुर और उनकी सुंदर रानी रूपमती के प्यार की यादों का बसेरा है। यहां अफगानी वास्तुकला का एक शानदार नमूना देखने को मिलेगा है। यहां घूमने लायक जगह हैं जहाज महल, रानी रूपमती का महल, बाजबहादुर का महल, अशर्फी महल, हिंडोला महल और शाही हमाम. यहां की जामी मस्जिद और होशंगशाह के मकबरे का नमूना लेकर ही बाद में ताजमहल बनाया गया।


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