सिंधिया का “धैर्य” और शिवराज का “समय”

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भोपाल।

मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह चौहान की मुख्यमंत्री के तौर पर वापसी हो गयी है इसी के साथ ही वे मध्यप्रदेश के राजनीति में ऐसे पहले नेता बन गये हैं जो चौथी बार मुख्यमंत्री बने हैं. शिवराज 2005 से 2018 तक लगातार मुख्यमंत्री रह चुके हैं और अब करीब 17 महीनों के अल्पविराम के बाद एक बार फिर अपनी पुरानी जगह वापस आ गये हैं.

इससे पहले मध्यप्रदेश में करीब सत्रह दिनों तक चले सत्ता के गंदे खेल के बाद आखिरकार कमलनाथ ने यह कहते हुये इस्तीफ़ा दे दिया था कि “मप्र में जो कुछ भी हुआ वह प्रजातांत्रिक मूल्यों के अवमूल्यन का एक नया अध्याय हैं”. दरअसल कमलनाथ सरकार कभी स्थिर थी ही नहीं, सीटों का अंतर बहुत कम होने और बहुमत के लिये दूसरों पर निर्भरता की वजह से कमलनाथ सरकार की स्थिरता को लेकर लगातार अटकलें चलती रहती थीं. मध्यप्रदेश में 15 साल से सत्ता में जमी भारतीय जनता पार्टी को हराकर कांग्रेस ने बहुत करीबी जीत के साथ सत्ता हासिल की थी. यह बराबरी का मुकाबला था, कांग्रेस को भाजपा से ज्यादा सीटें जरूर मिली थीं लेकिन उन्हें कामचलाऊ बहुमत भी नहीं मिला था और सरकार बनाने के लिये उन्हें दूसरों पर निर्भर होना पड़ा था. इसलिये मध्यप्रदेश में जो कुछ हुआ वो संभावित था, यहां कांग्रेस सरकार दोधारी तलवार पर चल रही थी, एक तरफ तो अल्पबहुमत के कारण उसे भाजपा की तरफ से खतरा था ही साथ ही वे अंदरूनी चुनौतियों से भी जूझ रही थी जिसकी बीज सरकार के गठन के साथ ही पड़ गयी थी और जिसके केंद्र में थे ज्योतिरादित्य सिंधिया.

मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार के गठन के साथ ही कांग्रेस और सिंधिया दोनों एक दूसरे की फांस बने हुये थे. अपना इस्तीफ़ा देने पर कमलनाथ का कहना था कि “एक महाराजा और उनके 22 विधायकों ने मिलकर उनकी सरकार के खिलाफ साजिश रची”.जबकि कमलनाथ के इस्तीफे के बाद सिंधिया का कहना था कि ‘इससे मध्यप्रदेश के जनता की जीत हुई है’. मध्यप्रदेश की राजनीति पर करीब से निगाह रखने वालों को सिंधिया का बगावत अप्रत्याशित नहीं लगा है. लोकसभा चुनाव के बाद से वे लगातार अपने असंतुष्ट होने का सन्देश दे रहे थे. उन्हें और उनके समर्थकों को लगता था कि पार्टी और प्रदेश की कांग्रेस सरकार में सिंधिया को उनके कद के मुताबिक़ सम्मान और पद नहीं दिया गया बल्कि उन्हें लगातार साईडलाईन करने की कोशिशें की गयीं. दरअसल प्रदेश में सत्ता हासिल करने के बाद पार्टी हाईकमान द्वारा सत्ता/संगठन के बंटवारे में पार्टी के सभी गुटों का ध्यान नहीं रखा गया और ना ही इनके बीच सामंजस्य की कोशिश की गयी. मध्यप्रदेश में 2018 का विधानसभा चुनाव कमलनाथ ने ज्योतिरादित्य सिंधिया के चेहरे को सामने रखते हुये लड़ा था लेकिन जीत के बाद कमलनाथ को मुख्यमंत्री बना दिया गया, सिंधिया अपने किसी करीबी को उपमुख्यमंत्री पद दिलाना चाहते थे लेकिन यह नहीं हो सका. इसके बाद सिंधिया मध्यप्रदेश में पार्टी अध्यक्ष बनाये जाने की उम्मीद कर रहे थे लेकिन इस पर भी कोई फैसला नहीं लिया गया और कमलनाथ ही मुख्यमंत्री के साथ अध्यक्ष बने रहे. यही नहीं 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें मध्यप्रदेश से निकाल कर उत्तरप्रदेश भेज दिया गया नतीजे के तौर पर वे गुना का अपना सीट ही लगभग एक लाख बीस हज़ार से भी ज़्यादा वोटों से हार गए. इसके बाद से लगातार मध्यप्रदेश में अपने भूमिका बढ़ाने और राज्यसभा के लिये हाथ-पैर मार रहे थे और इसके लिये हर तरह से दबाव बनाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन मध्यप्रदेश से राज्यसभा सीट के लिए पक्की समझी जाने वाले पहली सीट के लिये दिग्विजय सिंह के सामने आने के बाद आखिरकार उनका धैर्य जवाब दे गया और इसी के साथ ही कमलनाथ सरकार का समय भी समाप्त हो गया.

भाजपा नेता शुरुआत से ही कहते रहे हैं कि कमलनाथ सरकार अपने ही बोझ से गिर जायेगी इसके लिये उन्हें कोशिश करने की जरूरत नहीं है. लेकिन हकीकत यह है कि शुरू से ही भाजपा के नेता कमलनाथ सरकार को अस्थिर कर देने की धमकी देते रहे हैं.

हालाँकि जिस प्रकार से मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरी है उसे देखकर लगता है कि भाजपा नेताओं के इस दावे में दम था कि “कमलनाथ सरकार अपने ही बोझ से गिर जायेगी”. मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने सिर्फ सत्ता ही नहीं गवाईं है बल्कि अपना एक बड़ा नेता भी खो दिया है. सिंधिया मामूली नेता नहीं थे वे मौजूदा कांग्रेस के दूसरी पीढ़ी के प्रमुख नेताओं में से एक थे साथ ही वे राहुल गाँधी के निजी दोस्तों में भी शामिल थे. ऐसा लगता है सिंधिया गये नहीं हैं बल्कि उन्हें निकाला गया है. अगर पार्टी ध्यान देती तो सिंधिया के असंतोष को शांत किया जा सकता था लेकिन पार्टी मध्यप्रदेश में सत्ता और नेताओं द्वारा उनके इस असंतोष को और भड़काने का काम किया और राहुल गाँधी के इस्तीफे के बाद से कांग्रेस पार्टी में कोई केंद्रीय नेतृत्व ही नहीं हैं. केन्द्रीय नेतृत्व ने नाम पर जो भी व्यवस्था है वो इस पूरे मसले पर हाथ-पर हाथ धरे बैठा रहा. ऐसा नहीं है कि सिंधिया ने यह कदम अचानक उठाया हो बल्कि वो लोकसभा चुनाव के बाद से लगातार अपने हृदय परिवर्तन का सन्देश दे रहे थे. भाजपा ने इस पूरी स्थिति का पूरा फायदा उठाया और बहुत आसानी से सिंधिया खेमे और मध्यप्रदेश की सत्ता दोनों को हासिल कर लिया.

मध्यप्रदेश में कांग्रेस नेताओं के बीच गुटबाजी एक पुरानी समस्या रही है जो इस बार सत्ता हासिल करने के बाद और भी चौड़ी हो गयी थी. कमलनाथ एक अनुभवी नेता हैं उनके पास सरकार और संगठन दोनों की जिम्मेदारी थी. उनकी सरकार सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों के सहारे चल रही थी और वे इन्हें अपने साथ बनाये रखने में काफी उर्जा खर्च कर रहे थे. लेकिन शायद वे पार्टी के गुटबाजी पर ध्यान देने की जगह इसमें शामिल हो गये. यहीं उनसे चूक हो गयी जिसका खामियाजा उन्हें अपनी सरकार खोकर चुकाना पड़ा. दरअसल मोटे तौर पर प्रदेश कांग्रेस में तीन गुट थे. जिनमें कमलनाथ और और दिग्विजय सिंह का गुट मिलकर सिंधिया गुट के खिलाफ काम करने लगा था.

सत्ता और सिंधिया के भाजपा के पाले में जाने का मध्यप्रदेश की राजनीति में बहुत गहरा असर होगा. प्रदेश कांग्रेस में उम्रदराज कमलनाथ, दिग्विजय सिंह के बाद सिंधिया ही प्रमुख नेता थे. कमलनाथ, दिग्विजय सिंह दोनों ही अपने राजनीतिक जीवन के आखिरी दौर में हैं, इन दोनों नेताओं को अपने-अपने पुत्रों को मध्यप्रदेश की राजनीति में स्थापित करना है. सिंधिया इस दिशा में सबसे बड़े रोड़े थे, उनके जाने के बाद यह रोड़ा तो साफ़ हुआ है परन्तु अब मध्यप्रदेश कांग्रेस में नयी गुटबाजी सामने आ सकती हैं क्योंकि यहां दूसरी पीढ़ी के अरुण यादव, जीतू पटवारी और अजय सिंह राहुल जैसे कई नेता हैं जो सिंधिया के जाने के बाद अपनी राह आसन देख रहे हैं. ऐसे में स्वाभाविक रूप से उनका टकराव नकुलनाथ और जयवर्धन सिंह के साथ होगा. ऐसे में मध्यप्रदेश में कांग्रेस के लिए आने वाले साल नयी पढ़ी की स्थापना और इनके वर्चस्व के संघर्ष में बीतने वाले हैं .

कांग्रेस की तरह प्रदेश भाजपा में भी कई गुट हैं जिनमें सबसे प्रभावी चौथी बार मुख्यमंत्री बने शिवराजसिंह चौहान को माना जाता है. सिंधिया के आने के बाद से प्रदेश भाजपा को एक और नया और बना-बनाया गुट मिल गया है जिसमें उनके खेमे के 22 विधायक भी शामिल हैं. समझा जाता है कि शिवराज सिंह को मजबूरी के चलते मुख्यमंत्री बनाया गया है जिसमें उनका अनुभवी होने, संघ के दबाव के साथ कई और फेक्टर शामिल हैं. गौरतलब है मुख्यमंत्री पद के लिये केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर आखिरी समय तक एक बड़े दावेदार के रूप में शिवराज के सामने थे. लेकिन उनका ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से होना उनके खिलाफ चला गया जहां से ज्योतिरादित्य सिंधिया और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा भी आते हैं.जबकि प्रदेश में जमीनी पकड़, अधिकतर भाजपा विधायकों की पहली पसंद, मुख्यमंत्री के तौर पर लम्बा अनुभव, संतुलन साधने में माहिर होना और ओबीसी समुदाय से होना शिवराज के पक्ष में गया. इसकी झलक प्रधानमंत्री के उस ट्वीट से भी मिलती है जिसमें उन्होंने शिवराज को बधाई देते हुये उन्हें कुशल,अनुभवी प्रशासक और मध्यप्रदेश के विकास के लिए बेहद भावुक बताया है.

बहरहाल पहले के तीन कार्यकाल के मुकाबले इस बार उनका कार्यकाल अधिक चुनौतीपूर्ण रहने वाला है. आने वाले महीनों में उन्हें सिंधिया समर्थकों द्वारा खाली किये गये 24 सीटों पर उपचुनाव में उतरना है और सबसे अधिक पार्टी के अन्य गुटों के साथ साथ सिंधिया और उनके साथ भाजपा में शामिल हुये लोगों को सत्ता/ संगठन एडजस्‍ट करते हुये संतुलन के साथ आगे बढ़ना हैं. इसी प्रकार से आने वाले समय में नवगठित भाजपा सरकार की भी वही स्थिति रहने वाली है जो अभी तक कमलनाथ सरकार की रही है. अपने इस्तीफे से पहले कमलनाथ ने कहा था कि “आज के बाद कल और कल के बाद परसों भी आता है, मध्यप्रदेश में परसों भी आएगा.” प्रदेश कांग्रेस कमेटी के इस ट्वीट में कहा गया है कि ‘यह बेहद अल्प विश्राम है’, आगामी 15 अगस्त 2020 को कमलनाथ ही मप्र के मुख्यमंत्री के तौर पर ध्वजारोहण करेंगे और परेड की सलामी लेंगे. दरअसल कांग्रेस की उम्मीदें सिंधिया समर्थक 24 विधायकों की सीटों पर होने वाले उपचुनाव पर टिकी हुईं हैं. लेकिन यह इतना आसान नहीं है. इनमें से अधिकतर सीटें ज्योतिरादित्य सिंधिया के असर वाले गुना-ग्वालियर-चंबल संभाग में हैं, जो अभी तक कांग्रेस ने सिंधिया के ही हवाले किया हुआ था .ऐसे में इन सीटों पर कांग्रेस को सिंधिया और भाजपा की संयुक्त ताकत से मुकाबला करना होगा इसके लिये कांग्रेस को रणनीतियों और नेताओं के जरूरत होगी. दूसरी तरफ 24 सीटों पर भाजपा कम से कम 9 सीटों पर भी जीत कर लेती है तो भी शिवराज सरकार बरकरार रहेगी.

बहरहाल 2018 विधानसभा चुनाव के बाद मध्यप्रदेश की राजनीति ने बहुत जल्दी ही 360 डिग्री का टर्न ले लिया है. अब आगामी सबसे महत्वपूर्ण तारीख इन 24 सीटों पर होने वाले उपचुनाव के नतीजों का दिन होगा. जिससे कमलनाथ के “धैर्य” और शिवराज के “समय” का पता चलेगा.

(ये लेखक जावेद अनीस ,वरिष्ठ पत्रकार के निजी विचार है।)

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