जिसे भिखारी समझकर पुलिस अफसरों ने की मदद, वो निकला उनका ही दोस्त शार्प शूटर सब इंस्पेक्टर

ठंड में कचरे के ढेर में खाना ढूंढते एक भिखारी ने जब अफसरों को नाम से बुलाया तो वे चौंक गए, फिर पूरी कहानी पता चली

ग्वालियर, अतुल सक्सेना| आम तौर पर समाज में पुलिस (Police) की जो तस्वीर पेश की जाती है वो कड़क, असंवेदनशील, रिश्वतखोर, बेईमान की होती है लेकिन ग्वालियर (Gwalior) में एक तस्वीर ऐसी सामने आई है जिसने पुलिस की उस छवि को दिखाया है जो उसका दूसरा पहलू है। दरअसल ठंड में कचरे के ढेर में खाना ढूंढते एक भिखारी को जब दो पुलिस अफसरों ने देखा तो वे उसके पास गए। एक ने उसे अपनी जैकेट दी तो दूसरे ने अपने जूते दिये, अफसरों ने भिखारी को खाने के लिए चलने के लिए कहा लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ जब भिखारी ने दोनों अफसरों को उनका नाम लेकर बुलाया। बात करने पर पता चला कि ये उनका बैच मेट सब इंस्पेक्टर है, जो एक शानदार पुलिस अफसर ही नहीं कभी शार्प शूटर भी हुआ करता था।

ग्वालियर पुलिस (Gwalior Police) की क्राइम ब्रांच में पदस्थ डीएसपी रत्नेश तोमर (Ratnesh Tomar) के मुताबिक मतगणना (Counting) वाले दिन ड्यूटी पूरी कर जब वे अपने दोस्त डीएसपी विजय भदौरिया (DSP Vijay Bhadauria) के साथ रात को घर लौट रहे थे। तो रास्ते में बंधन वाटिका के पास एक भिखारी कचरे के ढेर में कुछ ढूंढ रहा था। पास जाने पर पता चला कि वो ठंड से कांप रहा था, उसके पैर में जूते नहीं थे। उसकी हालत देख कर उन दोनों ने उसे अपने जूते और जैकेट दी। बात करने पर पता चला कि वो कचरे में खाना ढूंढ रहा था। उन्होंने उसे खाना खाने के लिए कहा और आगे बढ़ने लगे तो भिखारी ने आवाज लगाकर विजय भदौरिया को बुलाया। एक भिखारी के मुँह से नाम सुनकर वे दोनों ठिठक गए। उन्होंने जब बात की तो उसने अपना नाम मनीष मिश्रा (Manish Mishra) बताया। उसने बताया कि वो 1999 बैच का सब इंस्पेक्टर है। उसकी ये दशा देखकर दोनों चौंक गए और पुराने दिन याद करने लगे। बात करने के बाद डीएसपी विजय भदौरिया और रत्नेश तोमर उसे अपने साथ ले जाने लगे तो उसने जाने से इंकार कर दिया। बाद में इन लोगों ने एक समाजसेवी संस्था को बुलाकर इलाज के लिए उसके साथ भेज दिया।

रत्नेश तोमर ने बताया कि मनीष मिश्रा 1999 में सब इंस्पेक्टर के रूप में पुलिस में आये थे और 2005 तक उन्होंने नौकरी की। उन्होंने कई जिलों में पदस्थ रहे। नौकरी के अंतिम दिनों में वे दतिया में पदस्थ रहे उसके बाद उनकी मानसिक स्थिति खराब हो गई । परिजनों ने उनका बहुत इलाज कराया , पांच साल तक वे घर पर रहे। उसके बाद घर से निकल गए । परिजनों ने उन्हें जहाँ भी इलाज के लिये भर्ती कराया वे वहाँ से भाग गए। लंबे समय से उनके परिवार वालों को भी नहीं पता था कि वे कहाँ हैं। डीएसपी रत्नेश तोमर ने बताया कि मनीष मिश्रा एक काबिल अफसर रहे हैं वे शार्प शूटर रहे हैं। लेकिन उनकी ये हालत देखकर बहुत कष्ट हुआ। हमने उनके इलाज की व्यवस्था की है। उम्मीद करते हैं वे जल्दी ठीक हो जाएं।

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