एमपी उपचुनाव: सिंधिया के गढ़ में सियासी दंगल, ये रहेगी रणनीति

खास बात यह कि पार्टियों के अपने-अपने मुद्दे हैं, लेकिन हर क्षेत्र में पिछड़े बमोरी विधानसभा क्षेत्र का मतदाता उद्योग, रोजगार, सिंचाई और उच्च शिक्षा जैसी सुविधाओं की दरकार रखे जान पड़ रहा है।

गुना, विजय कुमार जोगी। चुनाव आचार संहिता लागू होते ही उपचुनाव का बिगुल बच चुका है। एक ओर प्रशासन अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुट गया है, तो राजनीतिक पार्टियों की सक्रियता भी बढ़ गई है। अब पार्टियों का पूरा जोर मतदाता को रिझाने पर रहेगा, जहां मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच होना है। इधर, बसपा और सपाक्स के भी मैदान में उतरने की संभावना है। यदि ऐसा हुआ, तो उपचुनाव काफी रोचक हो जाएगा। खास बात यह कि पार्टियों के अपने-अपने मुद्दे हैं, लेकिन हर क्षेत्र में पिछड़े बमोरी विधानसभा क्षेत्र का मतदाता उद्योग, रोजगार, सिंचाई और उच्च शिक्षा जैसी सुविधाओं की दरकार रखे जान पड़ रहा है।

बमोरी उपचुनाव में कांग्रेस से केएल अग्रवाल उम्मीदवार हैं, जबकि भाजपा ने अभी तक प्रत्याशी की अधिकृत घोषणा नहीं की है। हालांकि, महेंद्रसिंह सिसोदिया संभावित दावेदार के रूप में मैदान में सक्रिय नजर आ रहे हैं। इधर, बसपा और सपाक्स संगठन के भी उपचुनाव में उतरने की संभावना जताई जा रही है। अगर ऐसा होता है, तो चुनाव रोचक तो होगा, लेकिन मुकाबला भाजपा-कांग्रेस के बीच होने के आसार हैं। इधर, दोनों ही पार्टियों के बीच संघर्ष कड़ा है। एक ओर महेंद्रसिंह सिसोदिया कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं, जिन्हें पूर्व के भाजपाइयों के बीच सामंजस्य बैठाना होगा, तो केएल अग्रवाल पूर्व में भाजपा से ही विधायक चुनकर मंत्री तक का सफर कर चुके हैं, लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस का दामन थाम चुके हैं। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी टीम तैयार करने की है, क्योंकि ज्यादातर कांग्रेस कार्यकर्ता भाजपा का रुख कर चुके हैं।

यह रहेंगे पार्टियों के मुद्दे

भाजपा जिलाध्यक्ष गजेंद्रसिंह सिकरवार ने बताया कि बमोरी उपचुनाव में पार्टी केंद्र व राज्य सरकार के विकास कार्यों को जनता के बीच लेकर जाएगी। मुख्य मुद्दा कांग्रेस सरकार के 15 महीने का कार्यकाल होगा, जिसमें जनता को छलावा और भ्रष्टाचार के अलावा कुछ नहीं मिला। इसी तरह ग्रामीण कांग्रेस जिलाध्यक्ष मानसिंह परसौदा बताते हैं कि चुनाव में मुख्य मुद्दा ज्योतिरादित्य सिंधिया और भाजपा द्वारा कांग्रेस की सरकार को गिराना होगा, जिससे कांग्रेस अपने वचन पत्र को पूरा करने से रह गई। पांच साल का समय मिलता, तो भाजपा अगले चुनाव में नजर नहीं आती। इसके अलावा नया कृषि अध्यादेश, जो काला कानून है आदि मुद्दे भी उठेंगे।
– सीट पर कुल मतदाताः 205335
– महिलाः 98336
– पुरुषः 106999
– किनके बीच मुकाबला संभव है?
महेंद्रसिंह सिसोदिया (भाजपा) और केएल अग्रवाल (कांग्रेस)

पिछले चुनाव का परिणाम क्या रहा था?

कांग्रेस के महेंद्रसिंह सिसोदिया विजयी हुए थे। निकटतम प्रत्याशी भाजपा के बृजमोहनसिंह किरार रहे थे।
– कौनसे मुद्दे सीट पर चुनाव में हावी रहेंगे?
1. भाजपा विकास कार्यों के साथ कांग्रेस सरकार के 15 महीने के कार्यकाल को जनता के बीच रखेगी।
2. कांग्रेस नया कृषि अध्यादेश को काला कानून बताएगी। भाजपा के चरित्र को उजागर करेगी।
3. मतदाता के लिए उद्योग, रोजगार, सिंचाई और उच्च शिक्षा जैसी सुविधाएं ही मुख्य मुद्दा होंगी।

पिछली बार कितना मतदान प्रतिशत रहा?

79.27
– बागियों का कितना प्रभाव रहेगा?
भितरघात की संभावना तो है, लेकिन बड़े नेताओं की एकजुटता मतदाता को साधने का काम कर रही है।

सीट को लेकर कोई विशेष या रोचक बात?

बमोरी सीट वर्ष 2008 में अस्तित्व में आई। पहला चुनाव भाजपा से केएल और कांग्रेस से महेंद्र के बीच हुआ, जिसमें केएल जीते। 2013 में कांग्रेस से महेंद्र ने भाजपा के केएल को हराकर हिसाब बराबर किया। 2018 के चुनाव में केएल को भाजपा से टिकट नहीं मिला, तो बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़े और तीसरे नंबर पर रहे। यदि भाजपा से महेंद्र अधिकृत प्रत्याशी होते हैं, तो एक बार फिर दोनों प्रत्याशी आमने-सामने होंगे, लेकिन दोनों के दल बदल चुके होंगे।

चुनाव में कौनसा फैक्टर ज्यादा काम करेगा?

दल-बदल इस चुनाव का मुख्य फैक्टर होगा। क्योंकि, भाजपा के उम्मीदवार कांग्रेस छोड़ चुके हैं। वहीं पिछले विधानसभा चुनाव के समय भाजपा से बगाबत कर चुके केएल इस चुनाव में कांग्रेस का चेहरा बन चुके हैं। मतदाता भी दोनों ही उम्मीदवारों को अपनी उम्मीद की कसौटी पर तौलकर निर्णय लेगा।