पराक्रम दिवस: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती पर उनसे जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी

जिसके बाद कई राजनीतिक दलों द्वारा केंद्र सरकार से नेताजी पर संकलित पूरी किताब को सार्वजनिक करने की मांग भी उठाई गई थी।

भोपाल, डेस्क रिपोर्ट। 23 जनवरी 1897 में जन्मे एक विराट किरदार भारत का महान स्वतंत्रता सेनानी और एक रहस्यमयी किरदार बनकर रह जाएगा। यह किसने सोचा था। जी हां हम बात कर रहे हैं आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस (subhash chandra bose) की। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज की 125वीं जयंती है। जिनके जन्म उपलक्ष को पूरा भारत पराक्रम दिवस (prakarm diwas)  के रूप में मना रहा है।

नेता जी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 18 सितंबर को उड़ीसा-बंगाल डिवीजन के कटक (cuttak) में हुआ था। वही उनकी प्रारंभिक पढ़ाई कटक के कॉलेजिएट में हुई थी। जिसके बाद उनकी शिक्षा कॉलेज के प्रेसिडेंसी कॉलेज में हुई। इसके बाद इंडियन सिविल सर्विस की तैयारी के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस को इंग्लैंड के कैंब्रिज विश्वविद्यालय भेजा गया था। वहीं भारत की आजादी के लिए प्रतिबद्ध उन्होंने प्रशासनिक सेवा कार्य को त्याग 1920 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा ले लिया।

वहीं साल 1938 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित किए गए। उन्होंने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन किया। हालांकि महात्मा गांधी (mahatma gandhi) से नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विचारधारा बिल्कुल भिन्न थी। जिसके बाद 1939 में कांग्रेस अधिवेशन में गांधी के समर्थक को हराने के बाद गांधी और उसके बीच बढ़ी अनबन ने नेताजी को गांधी से दूर कर दिया।

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जिसके बाद 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद फौज (azaad hind fauj) की स्थापना कर नेता जी ने एक बात तो साबित कर दिया कि वह अंग्रेजो के खिलाफ लोहा लेने में किसी तरह से पीछे नहीं हटेंगे। आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को उन्होंने नारा दिया “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद फौज के समर्थन के लिए दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान नेताजी सोवियत संघ, जापान, जर्मनी जैसे कई देशों की यात्रा कर उनसे सहयोग मांगा।

वहीं 1945 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस जापान की यात्रा पर थे। जिसके बाद एक विमान दुर्घटना में उनकी मौत हो गई। हालांकि उनकी मौत हमेशा चर्चा का विषय रही। अगस्त 1945 में विमान दुर्घटना में उनकी मौत के 77 साल बीत जाने के बाद भी आज भी यह गुत्थी अनसुलझी और लोगों का मानना है कि नेताजी किसी गुमनामी बाबा की जिंदगी जी रहे थे।

हालांकि नेताजी की मौत की जांच पंडित जवाहरलाल नेहरू (jawahar lal nehru) से लेकर मनमोहन सिंह (manmoan singh) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (narendra modi) ने भी अधिकारियों को सौंपी लेकिन यह गुत्थी अब तक अनसुलझी है। नेताजी की मौत के विरोधाभास पर जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 3 दिसंबर 1955 को 3 सदस्य जांच समिति का गठन किया था इस कमेटी ने नेताजी के निधन की जापान की घोषणा को सही ठहराया था लेकिन सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई सुरेंद्र चंद्र बोस ने इस पर असहमति प्रकट की थी। जिसके बाद 1970 में एक बार फिर से जीडी खोसला (GD Khosla) की अध्यक्षता में जांच आयोग बैठाया गया लेकिन इस बार समर गुहा (samar guha) ने भी नेताजी की मौत को अविश्वसनीय करार दिया था।

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1999 में वाजपेई सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के जज मनोज मुखर्जी की अध्यक्षता में एक और जांच आयोग गठित किया था जिसने 2006 को आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि नेताजी की मृत्यु विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी। साथ ही यह भी माना गया था कि 18 अगस्त 1945 के दिन ताइवान में कोई विमान दुर्घटना हुई ही नहीं थी।

वही आजाद हिंद फौज को लेकर लिखी गई एक महत्वपूर्ण किताब के 6 पन्ने आज भी इस बात की गवाही देते हैं कि नेताजी की मौत के विषय में सब कुछ सही नहीं है। ए हिस्ट्री ऑफ इंडियन नेशन आर्मी 1942-45 नाम की किताब के 6 पन्ने को गृह मंत्रालय ने गोपनीय घोषित कर दिया था तब से किताब विवाद और उत्सुकता का विषय बनी हुई है। माना जाता है कि इस किताब में नेताजी के विमान हादसे से जुड़ी कई जानकारियां हैं। जिसके बाद कई राजनीतिक दलों द्वारा केंद्र सरकार से नेताजी पर संकलित पूरी किताब को सार्वजनिक करने की मांग भी उठाई गई थी।

वही नेता जी के जन्म दिवस के मौके पर पराक्रम दिवस मना रहे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेताजी के पराक्रम को साझा करते हुए उन्हें याद किया। इसके साथ ही देश के सभी नेताओं और जनता द्वारा आजाद हिंद फौज के संस्थापक और स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिवस पर उनके पराक्रम को याद किया जा रहा है।