शिवराज सरकार की बड़ी तैयारी, इनको उपलब्ध होगी बोनस राशि, कार्ययोजना शुरू, मिलेगा लाभ

बिक्री से जो मुनाफा होगा। उसका कुछ प्रतिशत विक्रय करने वाले वनवासियों के बीच बोनस के रूप में बांटा जाएगा।

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भोपाल, डेस्क रिपोर्ट। मध्य प्रदेश सरकार (MP Government) नई तैयारी में है। दरअसल अब वनवासियों को भी बोनस देने की तैयारी की जा रही है। जिसका लाभ हजारों वनवासियों को मिलेगा। इसके लिए तैयारी शुरू कर दी गई है। दरअसल प्रदेश में तेंदूपत्ता की तरह वनवासियों को शहद (Honey) का भी बोनस (Bonus) दिया जाएगा। जिसकी कार्य योजना तैयार की जा रही है। हालांकि ऐसे वनवासियों को बोनस का लाभ मिलेगा, जो शहद निकालकर राज्य लघु वनोपज संघ (State Minor Forest Produce Association) को बेचेंगे। इसके लिए शुरुआत में एक दर तय की जाएगी।

जानकारी के मुताबिक 1 साल भर में मुनाफा देखने के बाद वनोपज संघ तय करेगा कि आखिर कितनी राशि बोनस के रूप में वनवासियों को उपलब्ध करानी है। दरअसल इससे पहले पिछले साल तक 5 से 6 क्विंटल ही शहद इकट्ठा किया जा सकता था लेकिन संघ द्वारा पहली बार 24 क्विंटल से अधिक से अधिक शहद इकट्ठा किया गया है।

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मामले में मध्यप्रदेश राज्य लघु वनोपज संघ के प्रबंध संचालक पुष्पकर सिंह का कहना है कि तेंदूपत्ता की तरह ही शहद पर भी बोनस देने की तैयारी की जा रही है। प्रदेश में 24 क्विंटल से अधिक शहद इकट्ठा किया गया है जो अब तक की सर्वाधिक मात्रा है। इसे और बढ़ाया जाना सुनिश्चित किया जाएगा। वहीं अधिकारियों की माने तो साल भर में खरीदे जाने वाले शहद के मुनाफे का एक अंश ग्रामीणों को उपलब्ध कराया जाएगा। शहद के लिए शुरुआत में एक दर तय की जाएगी। जिसका भुगतान शहद खरीदते समय ही वनवासियों को किया जाएगा लेकिन बोनस का भुगतान बाद में होगा।

इससे पहले तक वनोपज संघ द्वारा हर साल 5 से 6 क्विंटल से अधिक शहद इकठ्ठा किया जाता था लेकिन इस बार संघ ने वन समितियों का सहयोग लिया और वन धन केंद्र के कार्यकर्ताओं के सहयोग से जंगल से शहद इकट्ठा करने की कार्रवाई सुनिश्चित की गई। जिसके बाद अब तक 24 क्विंटल से है इकट्ठा किया जा चुका है।

वनोपज संघ द्वारा इस बार 270 प्रति किलो की दर से शहद खरीदा गया है वही इस शहद को कांच के जार में पैक कर 600 प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि शहद को साफ कर अन्य प्रक्रिया और जार की कीमत मिलाकर विक्रय मूल तैयार किया जाता है। इस बिक्री से जो मुनाफा होगा। उसका कुछ प्रतिशत विक्रय करने वाले वनवासियों के बीच बोनस के रूप में बांटा जाएगा।