BJP के इस किले को भेदना कांग्रेस के लिए चुनौती, जयस बन सकता है जीत में रोड़ा

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भोपाल/बैतूल।

2014  में 3  सीटों पर सिमटी कांग्रेस अब 2019  में 29  सीटों का लक्ष्य लेकर मैदान में उतरने जा रही है।कांग्रेस की नजर इस बार बीजेपी के अभेद किलो पर है, जिसमें से एक बैतूल लोकसभा सीट भी है। कांग्रेस ने यहां से रामू टेकाम को मैदान में उतारा है वही बीजेपी ने संघ की पसंद दुर्गादास उईके को टिकट दिया है। वर्तमान में यहां से ज्योति धुर्वे सांसद है, लेकिन जाति प्रमाण पत्र निरस्त होने के चलते बीजेपी ने उनका टिकट काट दिया है।इस बार जितना भाजपा के लिए सीट बचाना चुनौती होगा उतना कांग्रेस के लिए अपने पैर जामाना। 

दरअसल, लोकसभा चुनाव में इस बार बैतूल सीट से भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने नए उम्मीदवार को मैदान में उतारा है। भाजपा ने संघ की पसंद और पेशे से शिक्षक दुर्गादास उइके उम्मीदवार बनाया है।उईके संघ में लंबे समय से सक्रिय है। गायत्री परिवार, शिक्षक संघ, भाजपा तथा आरएसएस जैसे चार संगठनों से जुड़े होने के कारण बीजेपी ने उन्हें मौका दिया है।वही डीडी व्यसन, गोसंवर्धन, जलसंंवर्धन जैसे अभियान भी लंबे समय से चला रहे है।  22 साल से आरएसएस से जुड़े डीडी उइके का नाम पिछली लोकसभा चुनाव में भी उम्मीदवार के रूप में आया था, लेकिन भाजपा ने ज्योति धुर्वे को टिकट दी थी। वही कांग्रेस ने युवा वकील रामू टेकाम को चुनावी मैदान में उतारा है। टेकाम 2006 से क्षेत्र में ���पनी सक्रिय बनाए हुए है। कांग्रेस में लोकसभा महासचिव का पद संभाल रहे हैं। आदिवासी परिषद यूथ विंग के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। विधानसभा चुनाव में चारों सीट कांग्रेस को जिताने में रामू टेकाम ने अहम भूमिका निभाई थी, इसीलिए कांग्रेस को भरोसा है कि लोकसभा चुनाव में भी टेकाम भारी मतों से विजयी होंगें।

कांग्रेस की राह नही आसान, जयस बढ़ाएगा मुश्किलें

इस सीट पर जहां बीजेपी की राह आसान नजर आ रही है वही कांग्रेस के लिए इस किले को भेदना बहुत मुश्किल साबित हो सकता है।कांग्रेस द्वारा उम्मीदवार का ऐलान होते ही यहां विरोध के स्वर फूटने लगे है। प्रत्याशी रामू टेकाम को गौंड समाज के ही लोगों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। गौंड समाज में एक गौंड होते हैं और दूसरे प्रधान। टेकाम प्रधान से आते हैं।  गौंड और प्रधान के बीच बैतूल में दरार खिंच गई है। गौंड दावेदार एक होने की रणनीति बना रहे हैं। वही दूसरी तरफ जयस ने भी कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा रखी है। लोकसभा चुनाव में वो भी ताल ठोकने को तैयार है। संभावना जताई जा रही है कि आदिवासी सीटों पर जयस कांग्रेस के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतार सकती है, जिसका फायदा बीजेपी को मिलना तय है।

विधानसभा मे कांग्रेस ने दिखाया अच्छा परफॉरमेंस

अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार के लिए यह लोकसभा सीट आरक्षित है। बैतूल लोकसभा सीट के अंतर्गत विधानसभा की 8 सीटें आती हैं, मुलताई, घोड़ाडोंगरी, हर्दा, अमला,भैंसदेही, हरसूद,बैतूल, तिमरनी । इन 8 विधानसभा सीटों में से 4 पर कांग्रेस और 4 पर बीजेपी का कब्जा है। दोनों के बराबर होने पर कांग्रेस को पूरा भरोसा है कि इस बार को भाजपा के किले को भेदने में कामयाब होगी।

बैतूल का राजनीतिक इतिहास

1967 में संसदीय सीट बनने के बाद से बैतूल पर कांग्रेस का ही कब्जा रहा, लेकिन 1977 में यह सीट कांग्रेस के हाथ से फिसलकर भारतीय लोकदल के हाथ में आ गई। हालांकि 1980 में फिर कांग्रेस ने इस सीट को अपने कब्जे में कर लिया और 1984 में भी अपना परचम लहराया, लेकिन 1989 में भाजपा प्रत्याशी को इस सीट से जीत हासिल हुई। जिसके बाद 1991 में कांग्रेस के असलम शेरखान ने कांग्रेस की हार का बदला लेकर जीत दर्ज कराई, लेकिन 1996 में फिर भाजपा ने बापसी की और लेकर अब तक इस सीट पर भाजपा 8 बार जीत दर्ज करा चुकी है और अब 9वीं बार भी जीत का परचम लहराने को तैयार दिख रही है। ज्योति धुर्वे ने कांग्रेस के अजय शाह को 3,28,614 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में बीजेपी की ज्योति धुर्वे को जहां 6,43,651 वोट मिले तो वहीं कांग्रेस प्रत्याशी अजय शाह को 3,15,037 वोट ही मिल सके।

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