इन सीटों पर गुटबाजी से जूझ रही भाजपा-कांग्रेस, भितरघात का खतरा

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भोपाल।  राजनीतिक दृष्टि से प्रदेश के मालवांचल को भारतीय जनता पार्टी का गढ़ माना जाता है, लेकिन इस बार इस क्षेत्र की दोनों लोकसभा सीट उज्जैन एवं इंदौर में भाजपा को भितरघात एवं गुटबाजी का खतरा ज्यादा है। हालांकि कांग्रेस प्रत्याशियों को भी गुटबाजी से जूझना पड़ रहा है। इंदौर के कांग्रेस विधायक एवं मंत्री पार्टी प्रत्याशी का प्रचार करने  से ज्यादा दूसरे लोकसभा क्षेत्रों में डेरा डाले हुए हैं।

इंदौर से भाजपा ने इंदौर विकास प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष शंकर ललवानी को प्रत्याशी बनाया है। ललवानी को पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पंसद माना जा रहा है। क्योंकि मुख्यमंत्री शिवराज ने ही ललवानी को इंदौर विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया था। यह बात अलग है कि इंदौर सीट पर प्रत्याशी तय करने में भाजपा हाईकमान को सबसे ज्यादा मंथन करना पड़ा। पार्टी के स्थानीय नेताओं की आपसी खींचतान की वजह से हाईकमान ने शिवराज की पंसद के ललवानी को प्रत्याशी बनाया। हालांकि मप्र भाजपा के अंदरखाने यह चर्चा है कि ललवानी के नाम का फैसला हाईकमान का है। ललवानी का किसी नेता ने विरोध नहीं किया, लेकिन चुनाव में गुटबाजी दिखाई देने लगी है। पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में स्थानीय नेता उतना उत्साह नहीं दिखा रहे हैं, जितना वे अपने समर्थक नेता के प्रचार में दिखाते थे। ललवानी को पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और मौजूदा सांसद सूमित्रा महाजन के खुले समर्थन की जरूरत है। दोनों नेताओं के समर्थक ललवानी के साथ पूरी ताकत के साथ नहीं जुटे हैं। हालांकि विजयवर्गीय और सुमित्रा महाजन के समर्थन नेता ललवानी के साथ प्रचार में दिखाई जरूर दे रहे हैं। लेकिन इंदौर में यह चर्चा सामान्य है कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के समर्थक ललवानी इंदौर सीट पर ताई-भाई की मर्जी के बिना जीत दर्ज करा पाएंगे। वहीं कांगे्रस प्रत्याशी पंकज सिंघई भी गुटबाजी से जूझ रहे हैं। उनके समर्थन में स्थानीय विधायक एवं मंत्री अभी प्रचार करने नहीं उतरे हैं। कमलनाथ सरकार में मंत्री जीतू पटवारी और तुलसी सिलावट दूसरे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। सिलावट इन दिनों ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए गुना संसदीय क्षेत्र में प्रचार कर रहे हैं। उन्होंने काफी समय से गुना क्षेत्र में डेरा डाल रखा है। इसी तरह जीतू पटवारी भी छिंदवाड़ा समेत पहले एवं दूसरे चरण की लोकसभा सीटों पर प्रचार कर रहे हैं। 

उज्जैन में गुटों में बंटी कांग्रेस 

उज्जैन में भाजपा-कांग्रेस दोनों ने इस बार हारे हुए प्रत्याशियों पर दांव खेला है। भाजपा के अनिल फिरोजिया पिछले साल तराना से विधानसभा चुनाव हार चुके हैं। वहीं कांग्रेस के बाबूलाल मालवीय भी तराना से एक बार विधायक रहने के बाद 2003 और 2008 का चुनाव हार गए थे। विधानसभा चुनाव में कुछ हद तक एकजुट होकर लड़ी कांग्रेस में अब गुटों की संख्या बढ़ गई है। वहीं भाजपा लगातार भितरघात की परेशानी से जूझ रही है। विधानसभा चुनाव में उज्जैन-आलोट संसदीय क्षेत्र की आठ विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने पांच पर जीत हासिल की थी। जिन तीन सीटों (उज्जैन उत्तर, उज्जैन दक्षिण, महिदपुर) पर पार्टी को हार मिली, वहां कांग्रेस के ही नेता बागी बनकर चुनाव लड़े थे और परिणाम पर गहरा असर डाला था। महिदपुर में तो अधिकृत कांग्रेस प्रत्याशी तीसरे नंबर पर रहे थे। इसके अलावा उज्जैन शहर की दोनों सीटें (उत्तर और दक्षिण) में भी पार्टी से बागी होकर लड़े उम्मीदवार कांग्रेस की हार का प्रमुख कारण थे। विधानसभा चुनाव से सीख लेते हुए कांग्रेस ने बागी नेताओं को मनाने की कोशिश की है। खुद मुख्यमंत्री कमलनाथ ने नाराज नेताओं से बात कर उन्हें पार्टी के लिए काम करने को कहा है। हालांकि इन नेताओं की अभी अधिकृत वापसी नहीं हुई है।

कमलनाथ समर्थकों के ही छह गुट

विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस में फिर गुटबाजी सामने आ गई है। उज्जैन जिले में ही कमलनाथ समर्थकों के छह गुट बन गए हैं। इसके अलावा सिंधिया और दिग्विजय सिंह के समर्थकों का गुट अलग है। लोकसभा चुनाव में कई दावेदार कतार में थे। मगर मालवीय का नाम तय होने के बाद एक खेमा नाराज हो गया। 

गेहलोत-सांसद में मनमुटाव से परेशान

उज्जैन में भाजपा के भीतर चल रहे घमासान से पार्टी के आला नेता परेशान हैं। उज्जैन में पहली बार पार्टी ने अपने जीते हुए सांसद का टिकट काटा है। सांसद चिंतामणि मालवीय ने बीता चुनाव तीन लाख से अधिक वोटों से जीता था और इस बार भी दावेदारी थी। मगर उन्हें उज्जैन के अलावा देवास से भी टिकट नहीं दिया गया। सूत्रों के अनुसार पार्टी के इस निर्णय में केंद्रीय मंत्री थावरचंद गेहलोत की भूमिका रही। गेहलोत अपने खेमे के किसी नेता को टिकट दिलाना चाहते थे, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह के चहेते अनिल फिरोजिया का नाम तय हुआ।