सिंधिया का गढ़ भेदने बीजेपी को नहीं मिल रहे उम्मीदवार, दो दशक से जीत की तलाश में पार्टी

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भोपाल। टिकट वितरण को लेकर भाजपा में लगातार घमासान जारी है। भोपाल सीट के कारण पार्टी अब तक इंदौर और ग्वालियर समेत छिंदवाड़ा और गुना हाई प्रोफाइल सीट पर प्रत्याशियोंं का चयन करने में देरी हो रही है। वहीं, गुना सीट पर एक बार फिर बीजेपी को कोई उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। यहां से वर्तमान सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। गुना सीट पर सिंधिया परिवार का कब्जा रहा है। यह सीट कांग्रेस का अभेद गढ़ बन चुकी है जिसमें सेंध लगाने के लिए बीजेपी कई सालों से जीताऊ उम्मीदवार की तलाश में है। 

दरअसल, गुना-शिवपुरी सीट सिंधिया परिवार की पारंपरिक सीट रही है। यहा सिंधिया परिवार का ही राज रहा। फिर चाहें दल बीजेपी हो या फिर कांग्रेस लेकिन उम्मीदवार सिर्फ सिंधिया परिवार का ही निर्वाचित होकर लोकसभा जाता है। 1989 से 1999 तक यहां भाजपा के टिकट से राजमाता विजयाराजे सिंधिया काबिज रहीं, उसके बाद माधवराव सिंधिया फिर उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया इस सीट पर काबिज हैं। इस बार भी ज्योतिरादित्य सिंधिया को ही सबसे अधिक प्रबल दावेदार इस सीट पर माना जा रहा है। हालांकि, बीच में उनके ग्वालियर सीट से भी चुनवा लड़ने की अटकलें चल रही हैं। सिंधिया का सामना बीजेपी को कोई ऐसा उम्मीदवार नहीं मिल रहा है जो उन्हें टक्कर दे सके। 

क्या है सीट का राजनीतिक इतिहास

गुना शिवपुरी सीट माधनराव सिंधिया के एक दुर्घटना में मौत हो जाने के बाद खाली हुई थी। वह कांग्रेस के टिकट पर इस सीट पर चुनाव लड़ते आए थे। उनकी मृत्यु के बाद बेटे ज्योतिरादित्य ने इस सीट की जिम्मेदारी संभाली। और जबसे अब तक वह यहां काबिज हैं। बीजेपी हर बार नए पैतरे आजमा कर सिंधिया को हराने का प्रयास करती रही है। लेकिन उसको आजतक विफलता ही हाथ लगी है। मोदी लहर भी इस सीट पर बीजेपी जीत नहीं दिला सकी। 

बीजेपी से किसका नाम रेस में शामिल

सिंधिया को घेरने के लिए बीजेपी कोई बड़ा चेहरा यहां नहीं उतार सकी है। इस बार पार्टी की स्थानीय इकाई किसी लोकल लीडर को टिकट देने की बात कर रही है जो वहां की जनता से जुड़ा हो और जिसे स्थानीय लोग जानते हों। लेकिन स्थिति इतनी खराब है कि स्थानी तो दूर बाहरी कोई नेता भी ऐसा नहीं है जो पार्टी को जीत दिला दे। कांग्रेस से इस सीट को कब्जे में वापस लेने भाजपा ने उप चुनाव -2002 में राव देशराज सिंह को चुनाव मैदान में उतारा, लेकिन करारी शिकस्त खाई। 2004 में हरिवल्लभ शुक्ला, 2009 में नरोत्तम मिश्रा, 2014 में जयभानसिंह पवैया जैसे दिग्गज नेता को भी भाजपा ने दांव पर लगाया, लेकिन पल्ले कुछ नहीं आया।