टिप्पणी: कमलनाथ सरकार की प्रशासनिक विफलता चित्रकूट हत्याकांड की जिम्मेदार

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भोपाल। अलतमश जलाल। 


चित्रकूट में दो जुड़वा भाइयों के अपहरण के 12 दिन बाद शव मिलने से प्रदेश की कानून व्यवस्था की पोल सबके सामने खुल गई है। मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिए ये समय सबसे चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने सत्ता में आने से पहले अपनी पार्टी के वचन पत्र में प्रदेश में बढ़ते अपराधों पर लगाम लगाने और जनता को सुरक्षित माहौल देने का वादा किया था। 

श्रेयांस और प्रियांश के अपहरण ने कानून व्यवस्था की प्रभावकारिता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। दोनों बच्चों का अपहरण और उनकी मौत सरकारी तंत्र के फेल होने का उदाहरण है। इस घटना की जिम्मेदारी पुलिस लेने से बच रही है। वहीं, सरकार भी पुलिस का पूरा बचाव करने की भूमिका में दिखाई दे रही है। दो मासूम बच्चों की मौत पुलिस की अक्षमता और निकम्मेपन की गवही दे रही है। मध्य प्रदेश पुलिस के डीजीपी वीके सिंह ने शनिवार को मुख्यमंत्री कमलनाथ से मुलाकात कर कमिश्नर प्रणाली लागू करने की बात की।  सरकारी तंत्र और पुलिस की लापरवाही के चलते दो मासूम मौत की घाट चढ़ गए और डीजीपी मुख्यमंत्री से कमिश्नर प्रणाली की बात कर रहे हैं। 12 दिन तक डीजीपी को पीड़ित परिवार से मिलने की फुर्सत तक नहीं मिली, यह पूरा मंजर बताता है कि  पुलिस इतने बड़े मामले पर कितनी संवेदनशील थी। जिनको चुनकर जनता ने विधानसभा भेजा और प्रदेश की जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है प्रदेश के गृहमंत्री बाला बच्चन भी इन 12 दिनों में पीड़ित परिवार से मिलने नहीं गए। 

इन घटनाओं के बाद नाथ को बच्चन के प्रति अपना प्रेम त्याग देना चाहिए। बच्चन भले नाथ के खास और इमानदार लोगों में शामिल हों लेकिन हाल ही में प्रदेश में हुई घटनाओं के बाद ये साबित होता है कि वह इस पद के लिए योग्य व्यक्ति नहीं हैं। घटना के बाद सरकार पुलिस अफसरोंं पर कार्रवाई करने में विफल हुई है। पुलिस अधिकारियों की एक बैठक में, नाथ ने कहा था कि अपराधी कानून से नहीं बच सकते हैं। नाथ को दिखाना है कि यह कैसे किया जाता है। बच्चों के अपहरणकर्ताओं को सजा मिलनी चाहिए। जो पुलिस वाले बच्चों को जिंदा बचाने और वापस लाने में नाकाम रहे, उन्हें भी सजा मिलनी चाहिए।

पुलिस सरकार से फ्री हैंड की मांग कर रही है। पुलिस कर्मचारी जो आम जनता को धमकाते नजर आते हैं वह राजनेताओं के सामने दंडवत हैं, उन्हें वह अधिकार मिले हैं जो किसी और के पास नहीं है। इस घटना से ये बात सामना आई है कि पुलिस को अधिकार देने से पहले उनके कर्तव्यों की भी समीक्षा होनी चाहिए। जिन आरोपियों को पुलिस ने पकड़ा है वह भले किसी राजनीतिक दल से संबंध रखते हों लेकिन उन्हें उनके गुनाहों की सजा मिलना ही चाहिए। सरकार इस घटना का ठीकरा दूसरे राजनीतिक दलों पर फोड़कर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। 

प्रदेश में हो रहे लगातार तबादले भी इस घटना के जिम्मेदार हैं। सरकार एक अफसर को कई बार एक जगह से दूसरी जगह भेज रही है। पुलिस प्रशासन काम करने के बजाए सरकार को खुश करने में व्यस्त है। पुलिस अफसरों को नेताओं के घरों के बाहर तबदाले की सिफारिश और मनमर्जी की जगह पोस्टिंग पाने के लिए इंतजार करते देखे जा सकते है। यही समय है जब मुख्यमंत्री कमलनाथ को अपने राजनीतिक अनुभव का सहारा लेते हुए कुछ ठोस कदम उठाना होंगे। वह लगातार ये बात दौहरा रहे हैं कि वह किसी के साथ अन्याया नहीं होने देंगे। अगर सरकार मासूम बच्चोंं के परिवार को न्याय दिलाने में कामयाब होती है तो वही सरकार की संवेदनशीलता का प्रमाण होगा।