वक्त बदलाव का, खुद पर विश्वास का

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भोपाल। मामला  देखने मे बहुत छोटा था, लेकिन प्रदेश के लिये बदलती तस्वीर सा।एक मुख्यमंत्री के हाथ की हथेली और ऊगंली का मध्यम श्रेणी का जटिल सा ऑपरेशन। शायद तो किसी को खबर भी नहीं लगती  कि कमलनाथ ने ऑपरेशन करा भी लिया। लेकिन खबर बनी और इतनी बड़ी खबर बनी कि शाम होते-होते विपक्षी नेता भी कमलनाथ के इस निर्णय के लिए  उनकी सराहना करने लगे। और हो भी क्यों न। बरसों के बाद प्रदेश के  मुखिया ने किसी सरकारी अस्पताल की दहलीज पर कदम रखे  और अपने ही सिस्टम पर 100% विश्वास जमाने की मिसाल भी पेश की। प्रौढ़ावस्था या वृद्ध अवस्था से गुजर रहे लोगों को पुराने दिन अगर याद हो तो जरा याद कीजिए। किसी भी सरकारी अस्पताल का डॉक्टर उस इलाके में देवदूत की तरह पूजा जाता था। उसके ज्ञान, काबिलियत और हुनर पर लोगों को यकीनन विश्वास था। अस्पताल से बाहर भी इलाके में डॉक्टर को जो सम्मान और इज्जत मिलती थी अच्छे-अच्छे प्रोफेशन के लोगों के लिए रश्क का कारण बन जाती थी। लेकिन धीरे धीरे राजनीतिक और सरकारी संरक्षण के चलते इस व्यवस्था का अच्छा होने लगा। सुनियोजित षड्यंत्र के तहत सरकारी अस्पतालों को नर्क और सरकारी डॉक्टरों को यमदूत की संज्ञा दी जाने लगी। इलाज के नाम पर सरकारी धन से निजी अस्पतालों में जो बंदरबांट शुरू हुई उसने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को तहस-नहस करके रख दिया। हालात यह हुए  कि लोग सरकारी अस्पताल में जाने से ही कतराने लगे। पढ़े लिखे नौजवान भी सरकारी डॉक्टर या पैरामेडिकल स्टाफ की सरकारी नौकरी करने से कतराने लगे और हालात यह बने कि मध्य प्रदेश में आज भी स्वास्थ विभाग के आधे से ज्यादा पद खाली पड़े है। ऐसे में कमलनाथ का अपने इलाज के लिए हमीदिया अस्पताल में जाना सिर्फ अपना आपरेशन कराना नहीं है। 40 साल से ज्यादा राजनीतिक अनुभव लिए कमलनाथ जानते हैं कि जनता के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं जुटा कर ही एक समृद्ध और विकसित देश की कल्पना की जा सकती है। ऐसे में यदि एक मुख्यमंत्री किसी सरकारी अस्पताल के अंदर इलाज के लिए जाता है तो न केवल आम जनता में सरकारी अस्पतालों के प्रति विश्वास जागेगा बल्कि उस अस्पताल में काम करने वाले डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के मन में भी समाज और सरकार के प्रति अपने कर्तव्य बोध के साथ साथ उत्साह का बोध भी होगा कि अब हम पर दोबारा विश्वास किया जाने लगा है। उम्मीद है कि आने वाले समय में कमलनाथ का यह कदम सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में गुणात्मक सुधार की दृष्टि से मील का पत्थर साबित होगा।