बीजेपी का अभेद किला है यह सीट, केंद्रीय मंत्री का नाम फिर आया सामने

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भोपाल। मध्य प्रदेश की देवास लोकसभा सीट भाजपा का दशकों से गढ़ रही है। यह संसदीय क्षेत्र मालवा में आता है। यह सीट अनुसूचित जाति के उम्मीदवार के लिए आरक्षित है। यह सीट बीजेपी के अभेद किले में तब्दील हो गई है। कांग्रेस सालोंं से यहां जीत की तलाश कर रही है। इस सीट से 2014 में बीजेपी के मनोहर ऊंटवाल ने चुनाव जीता था।  हाल ही में वह विधानसभा चुनाव में आगर विधानसभा से चुनाव जीते हैं। इसलिए यह सीट खाली हो गई है। अब बीजेपी को इस सीट पर नए चेहरे की तलाश है। वहीं, कांग्रेस से इस सीट पर मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के बेटे का नाम सामने आ रहा है। 

इस सीट से 2009 में कांग्रेस के सज्जन सिंह वर्मा ने बीजेपी के थावरचंद गहलोत को बड़ा झटका दिया था। दशकों से बीजेपी की कब्जे वाली सीट पर वर्मा ने जीत दर्ज की थी। लेकिन मोदी लहर में बीजेपी ने कांग्रेस से यह सीट हासिल करली। 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में सज्जन सिंह वर्मा यहां से सोनकच्छ विधानसभा से विधायक चुने गए हैं और वर्तमान सरकार में वह लोक निर्माण मंत्री हैं। 

मोदी लहर में बीजेपी ने जीती थी सीट

इस सीट पर 2009 में कांग्रेस का कब्जा था। लेकिन 2014 में हुए आम चुनाव में मोदी लहर के चलते कांग्रेस के कई दिग्गज चुनाव हारे इसमें सज्जन सिंह वर्मा भी शामिल थे। बीजेपी ने 2014 में इस सीट पर 2.6 लाख वोट से जीत दर्ज की थी। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में इस बार बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने चार चार विधानसभा सीटें जीती हैं। लेकिन अगर मत प्रतिशत की बात की जाए तो कांग्रेस को इस संसदीय क्षेत्र से बीजेपी की तुलना में 40 हजार अधिक वोट मिले हैं। 

क्या है यहां मुद्दे

इस क्षेत्र में विकास की बहुत कमी है। यहां बेरोजगारी बड़ा मुद्दा है। कृषि संकट से लेकर व्यापारियों के बीच गुस्सा, बेरोजगारी और विकास की कमी प्रमुख मुद्दे रहे हैं, और यह गुस्सा राज्य सरकार के उम्मीदवार के रूप में दिखाई दे रहा था। देवास सीट शाजापुर, देवास, आगर मालवा और सीहोर जिलों में फैली हुई है। सज्जन सिंह वर्मा के अलावा, कांग्रेस के युवा चेहरे कुणाल चौधरी ने भी काला पीपल विधानसभा सीट से जीत दर्ज की है। यहां के मतदाताओं ने अतीत में भाजपा को पसंद किया है। कस्बे और आस-पास के क्षेत्रों में अभी भी पूर्ववर्ती रियासतों का प्रभाव है। 

क्या है राजनीतिक इतिहास

देवास लोकसभा सीट, जैसा कि 1962 में जाना जाता था, जनसंघ के उम्मीदवार हुकुम चंद कच्छवाई द्वारा जीती गई थी। बाद में, इसे शाजापुर निर्वाचन क्षेत्र के रूप में नाम दिया गया। जनसंघ के बाबूराव पटेल ने 1967 में सीट जीती। जनसंघ के दूसरे दिग्गज जगन्नाथ जोशी 1971 के चुनाव में निर्वाचित हुए। बाद में, 1977 में, भारतीय जनता दल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने वाले फूल चंद्र वर्मा ने यहाँ से जीत हासिल की। 1980 में, वर्मा ने फिर से जीत हासिल की, जब जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा, तो उन्होंने कांग्रेस के रामभजन गौतम को हराया। इस निर्वाचन क्षेत्र के कांग्रेस-विरोधी मूड का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस को यहां जीतने में 27 साल लग गए। इससे पहले, यह 1957 में  कांग्रेस की लीला धर जोशी ने जीत हासिल की थी।

फिर 2004 में गहलोत को लगातार चौथी बार जीत मिली थी। उन्होंने श्याम मालवीय को हराया था। लेकिन 2009 में गहलोत को बड़ा झटका लगा कांग्रेस के सज्जन सिंह वर्मा ने उन्हें यहां से हराया। हालांकि, वर्मा मह 15 हजार वोटों से जीते थे। लेकिन मोदी लहर में 2014 में बीजेपी इस सीट पर एक बार फिर कमल खिलाने में सफल रही। मनोहर ऊंटवाल को दो लाख से अधिक वोटों से जीत मिली थी। 

बीजेपी के मनोहर ने विधानसभा चुनाव लड़ा और वह विधायक चुने गए। हालांकि, चौथी बार राज्य में बीजेपी सरकार बनाने में विफल हो गई। अब बीजेपी को यहां नए चेहरे की तलाश है। हालांकि, पार्टी गहलोत को भी इस सीट पर उतारने का विचार कर रही है। वह फिलहाल राज्यसभा सांसद और केंद्र में मंत्री हैं।