चित्रकूट में मंदाकिनी को प्रदूषण मुक्त करने का हर्बल ट्रीटमेंट शुरू

सतना//पुष्पराज सिंह बघेल. मध्यप्रदेश(madhyapradesh) – उत्तर प्रदेश(uttarpradesh) की सरहदी पवित्र तीर्थस्थल चित्रकूट(chitrakoot) की मंदाकिनी(mandakini) गंगा(ganga) को प्रदूषण मुक्त करने के लिए इन दिनों हर्बल ट्रीटमेंट(herbal treatment) दिया जा रहा है। समूचे विंध्य क्षेत्र में ये पहला मौका है, जब किसी नदी के पारिस्थितिक पुनरोद्धार के लिए ऐसी अनूठी पहल अमल में लाई गई है। पॉयलट प्रोजेक्ट(pilot project) के तहत एमपी(mp)-यूपी(up) के सरहदी क्षेत्र पर स्थित मंदाकिनी गंगा के 500 मीटर का चयन किया गया है। जिसमें सतना(satna) जिले की सियाराम कुटीर से भरतघाट और फिर उत्तर प्रदेश के रामघाट तक प्रायोगिक तौर पर नदी के प्रदूषित जल को हमेशा के लिए शुद्ध करने के लिए आयुर्वेदिक पद्धति का उपयोग किया गया है।

हर्बल ट्रीटमेंट का जिम्मा वर्णिका एफएमसीजी को

राम की तपो भूमि चित्रकूट की जिस मंदाकिनी नदी का जल अभी तक आचमन के लायक नहीं माना जाता था, अब उसी जल को जल्दी ही पेयजल के रुप में इस्तेमाल किया जा सकेगा। ये मंदाकिनी नदी के जल में कराए जा रहे हर्बल ट्रीटमेंट का शुरुआती असर है। चित्रकूट में मंदाकिनी नदी पुनर्स्थापना परियोजना के तहत आयुर्वेदिक उपचार का निर्णय लिया गया था। जिसमें हर्बल ट्रीटमेंट का जिम्मा इंदौर(indore) की वर्णिका एफएमसीजी प्रोडक्टस(FMCG Product) एलएलपी को सौंपा गया था। काउनोमिक्स तकनीक से पहला ट्रीटमेंट भरतघाट में किया गया। इसके तहत तकरीबन 5 हजार लीटर सघन द्रव्य को फूलमाता चौक,भरघाट और हनुमान सेतु से नदी के जल में प्रवाहित किया गया। 24 दिन में लगभग 12 डोज दिए गए। जिला प्रशासन ने उपचार बाद तय समय सीमा पर जल के नए सिरे से सैंपल लिए और इन्हें एनएबीएल से अधिकृत जबलपुर(JABALPUR) की जल परीक्षण प्रयोगशाला में भेजा गया जिसके परिणाम बेहद सुखद रहे। जल में जहां आक्सीजन(OXYGEN) की मात्रा बढ़ी पाई गई, वहीं पहले की अपेक्षा पानी में हल्कापन मिला। जिन घाटों में सिर्फ 2 सीढिय़ां दिखती थीं, अब नीचे की 4 से 5 सीढिय़ां साफ तौर पर दिखने लगी हैं। खज्जी,जलकुंभी और खरपतवार भी तेजी के साथ गलने लगे हैं।

चित्रकूट नगर परिषद के सीएमओ रमाकांत शुक्ला ने बताया कि ये पद्धति पूरी तरह से आयुर्वेदिक पद्धति है। पिछले साल जब मैंने जॉइन किया था तो मंदाकिनी में इतनी खज्जी थी कि पानी आचमन के लायक भी नहीं था। लोग आते थे तो मंदाकिनी में आचमन करने और नहाने से कतराते थे।

वहीं इंदौर की वर्णिका एफएमसीजी ने कहा कि हम आयुर्वेदिक पद्धति से इसका उपचार करेंगे। इससे न मछलियों को कोई नुकसान होगा, न किसी मानव अथवा जानवर को नुकसान होगा। आयुर्वेद पद्धति से हम गंगा की सफाई करेंगे। सुधार काफी दिख रहा है गंगा में। जिस प्रकार से इनका ट्रीटमेंट चल रहा है उस हिसाब से सौ फीसदी उम्मीद है कि गंगा पूरी तरह से स्वच्छ हो जाएंगी।

नाविक शिंकू निषाद ने बताया कि ये दवा जो डाली जा रही है तो उस दवा का काफी प्रभाव पड़ा है गंगा मैया में। यहां इतनी घास और इतनी खज्जी उग जाती थी कि नाव चलाने में भी दिक्कत होती है। टूरिस्ट भी आकर बोलते थे कि ये तो नाला के जैसा दिख रहा है क्या ये मंदाकिनी मइया हैं। लेकिन जब से ये दवा पड़ने लगी है तबसे से खज्जी वगैरह साफ होने लगी है।

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