बैटल अॉफ एमपी: आरक्षित सीटों पर इस बार मुकाबला सबसे ज्यादा कठिन, ऐसे समझें गणित

shivraj singh chouhan

भोपाल। मध्य प्रदेश का चुनावी गणित इस बार बिगड़ा हुआ है। बदलाव की कोशिश कर रही कांग्रेस विश्वास की कमी से जूझ रही है तो भाजपा में संशय की स्थिति है। यही स्थिति यहां के मतदाता की है जो बदलाव की बात तो करता है, लेकिन विकल्प को लेकर भ्रमित है। इस बार आरक्षित सीटों पर कांग्रेस और भाजपा के अलावा तीसरे दल भी चुनौती दे रहे हैं। प्रदेश में 230 कुल सीटों में से 35 एससी और 47 एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। माना जा रहा है जिस पार्टी को आरक्षित सीटों में से अधिक मिलेंगी उसकी सरकार बनने की पूरी संभावना है। 

एससी एसटी एक्ट को लेकर सवर्णों में इस बार भारी आक्रोश है। बड़े पैमाने पर आंदोलन भी किया गया था। इस बार कांग्रेस को विश्वास है कि वह भाजपा से कई आरक्षित सीटें हासिल करने में कामयाब होगी। लेकिन भाजपा भी जीती हुई सीटों को किसी भी हाल में अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती है। यही कारण है भाजपा ने लगातार आरक्षित वर्ग को साधने की कोशिश की है। इस बार भाजपा कई सीटों पर हिचकोले लेती दिख रही है। और कांग्रेस इसी का लाभ उठाना चाहती है। 

कुल 82 आरक्षित सीटों में से भाजपा 59 सीटों पर काबिज है। जबकि कांग्रेस के पास सिर्फ 19 सीटें हैं। वहीं, बीएसपी के पास तीन सीटें हैं और एक सीट बीएसपी से निर्दलीय ने झटक ली थी। इस बार एससी एसटी वर्ग को साधने में भाजपा से नाराज सवर्ण सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। वहीं, सवर्ण को साधने में भाजपा के हाथ से आरक्षित वर्ग का बड़ा वोट बैंक हाथ से फिसलने का डर है। ऐसे में भाजपा में संशय की स्थिति बनी हुई है। इसलिए भाजपा ने आरक्षित सीटों पर ऐसे प्रत्याशी को मैदान में उतारा है जिनकी छवि सवर्णों में अच्छी है और जो उनका समर्थन प्राप्त करने में कामयाब हो सकते हैं। जहां हार का डर था उन सीटों पर उम्मीदवारों को बदल दिया गया है। 59 में से भाजपा ने 28 वर्तमान विधायकों को बदला है। वहीं, कांग्रेस ने सिर्फ दो विधायकों का टिकट बदला है 

इस तरह समझें आरक्षित सीटों का गणित

ग्वालियर-चंबल: यहां कुल 34 सीटें हैं। इनमें से सात आरक्षित हैं। भाजपा पिछले चुनाव में आरक्षित सीटों में से चार जीती थी, कांग्रेस दो और बीएसपी एक सीट पाने में कामयाब हुई थी। भाजपा ने इस बार तीन वर्तमान विधायकों का टिकट काटा है। इनमें पन्नालाल भी शामिल हैं जो पिछली बा गुना से 45 हजार वोट से जीते थे। उन्हें विवादित बयान देने की वजह से टिकट नहीं मिला। गुना से इस बार भाजपा ने गोपीलाल जाटव को उतारा है। वह अशोकनगर से वर्तमान विधायक हैं। सिर्फ मंत्री लाल सिंह आर्य को पार्टी ने गोहद से रिपीट किया है। 

बुंदेलखंड: कुल 26 सीटों में से यहां पर 6 आरक्षित सीटें हैं। इनमें से पांच पर भाजपा और एक पर कांग्रेस काबिज है। भाजपा ने इस बार बीना, नरयावली और चांदला से वर्तमान विधायकों को टिटक दिया है। जबकि, हटा और गन्नौर से वर्तमान विधायकों के टिकट कटे हैं। अप्रैल में हुआ बंद में दिलत आंदोलन का सबसे ज्यादा प्रभाव इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में देखने को मिला था। कांग्रेस ने जतारा से एक सीट जीती थी। इस सीट पर कांग्रेस के दिनेश कुमार अहिरवार जीते थे। इस बार कांग्रेस ने यह सीट किसी और दल के लिए छोड़ दी है। 

विंध्य: यहां कुल 30 सीटें हैं। इनमें से 12 सीटें आरक्षित हैं। यहां भाजपा की झोली में पिछले चुनाव में सात सीटें आईं थी। कांग्रेस को तीन और बीएसपी को दो सीटोंं पर संतोष करना पड़ा था। इस बार फिर भाजपा ने तीन कैंडिडेट को दोबारा उतारा है और तीन के टिकट कांटे हैं। और एक वर्तमान विधायक की सीट जैतपुर से जयसिंहनगर कर दी गई है। कांग्रेस और बीएसपी ने अपने पिछले उम्मीदवारों को दोहराया है। 

महाकौशल: 38 सीटों में से 16 आरक्षित सीटें हैं। इनमें भाजपा के पास नौ और कांग्रेस के पास सात सीटों हैं। यहां भी भाजपा को तीन वर्तमान विधायकों का टिकट काटना पड़ा है। जबकि 6 विधायकों पर दोबारा भरोसा किया है। वहीं, कांग्रेस ने छह विधायकों को दोबारा मौका दिया है। पांढुर्ना से जनत उइके का टिकट कांग्रेस ने इस बार काटा है। जो पिछला चुनाव 14 वोटों के आस पास जीते थे।

मध्य: मध्य भारत कहे जाने वाले इस अंचल में 36 सीटें हैं। इनमें दस आरक्षित सीटें हैं। यहां कांग्रेस सबसे कमजोर है। पिछले चुनाव में भाजपा ने पूरी दस सीटों पर बाजी मारी थी। हालांकि, इस बार वोटर का मिजाज देखते हुए पार्टी ने पांच वर्तमान विधायकों के टिकट काट दिए हैं। भाजपा ने टिकट कटने के पीछे फसके आंतिरक सर्वे रिपोर्ट को बताया है। कांग्रेस ने पिछले हार हुए उम्मीदवारों पर एक बार फिर दांव लगाया है। 

मालवा निमाड़: सरकार बनाने में इस अंचल का सबसे बड़ा योगदान रहता है। सबसे अधिक आरक्षित सीटें भी यहीं से हैं। कुल 66 में से 31 आरक्षित सीटें हैं। इनमें से 24 पर भाजपा और 6 पर कांग्रेस का कब्जा है। और एक सीट निर्दलीय के पास है। इस बार मंदसौर गोली कांड का प्रभाव सबसे अधिक भाजपा को झेलना पड़ रहा है। यही कारण है पार्टी ने 11 वर्तमान विधायकोंं के टिकट काटे हैं। और 13 को दोबारा मैदान में उतारा है.