कृषि बिल

भोपाल। पर्यावरण को बचाने के लिए राज्य सरकार प्रदेश भर में लोगों से पौधे लगाने के लिए अपील कर रही है। सभी जिलों में प्रशासन पौधरोपण करने के लिए अलग अलग तरह की मुहिम चला रहा है। ऐसे समय में प्रदेश सरकार किसानों को राहत देने के मूड में है। सरकार ऐसा फैसला लेने के मूड में है जो हरियाली को प्रभावित कर सकता है लेकिन किसानों के लिए वह काफी राहतभरा होगा। दरअसल, अभी तक किसानों को अपने खेतों में लगे पेड़ों को काटने के लिए तहसीलदार से अनुमति लेना पड़ती है। इस प्रक्रिया में काफी समय भी लग जाता है साथ ही भ्रष्टाचार का डर भी बना रहता है। सरकार ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर रही है जिससे किसानों बिना अनुमति लिए ही अपने खेत के पेड़ काट सकें। 

विधानसभा चुनाव के समय कांग्रेस ने किसानों से विभिन्न वादे किए थे। इस संबंध में राजस्व विभाग ने एक प्रस्ताव तैयार कर सरकार को भेजा है। हालांकि, वरिष्ठ सचिवों की एक समिति ने इस प्रस्ताव को लेकर आपत्ति ली है। उनका कहना है कि अगर यह प्रस्ताव अमल में लाया जाता है तो इससे पेड़ों की बड़े पैमाने पर कटाई की जा सकती है जिससे पर्यावरण प्रभावित हो सकता है। मीडिया से चर्चा के दौरान राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव, मनीष रस्तोगी ने कहा कि प्रस्ताव सरकार को भेज दिया गया है। इस संबंध में निर्णय लिया जाना बाकी है। वर्तमान में, एक किसान को अपने खेत में एक पेड़ काटने के लिए तहसीलदार की अनुमति की आवश्यकता होती है। पहले जिला कलेक्टर द्वारा अनुमति दी जाती थी, लेकिन तब अधिकार तहसीलदार को सौंप दिए गए हैं।

बीते महीने मानसूम सत्र के दौरान राजस्व मंत्री गोविंद सिंह राजूत ने सदन में कहा था कि विभाग ने एक प्रस्ताव किया है जिसमें किसानों को पेड़ काटने के लिए अनुमति नहीं लेनी होगी। उन्होंने कहा था कि यह देखने में आया है कि अनुमति के बहाने से भ्रष्टाचार के मामले भी सामने आते रहते हैं। इस प्रस्ताव के पास होने से भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी। इस प्रस्ताव को लेकर अफसर दो मत हैं। एक खेमे का मानना है कि ऐसे समय में जब सरकार खुद हरियाली को बढ़ावा दे रही है और पौधरोपण के लिए विभिन्न अभियान भी चलाए जा रहे हैं ऐसे में किसानों के पेड़ काटने की अनुमति ठीक नहीं है। इससे आमजन में गलत संदेश जाएगा और यह बहस का मुद्दा बन जाएगा। साथ ही पर्यवरण को भी इस फैसले से नुकसान पहुंचेगा। फिर कितने पेड़ काटे गए इसका भी कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं रहेगा। अभी तक यह व्यवस्था जिला प्रशासन के पास मौजूद रहती है कि वह काटे गए पेड़ों का रिकॉर्ड मैंनटेंन करे।