राज्यपाल के निर्देश- पेसा एक्ट नियमों को शीघ्र अंतिम स्वरूप दें, फास्ट ट्रेक में हो दया याचिकाओं का समाधान

राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने कहा कि पेसा एक्ट (PESA Act) नियमों को शीघ्र ही अंतिम स्वरूप दिया जाए। उन्होंने समय-सीमा तय कर कार्य को पूर्ण किए जाने के निर्देश दिए।

भोपाल, डेस्क रिपोर्ट। सीएम शिवराज शिवराज सिंह चौहान की घोषणा के अनुसार आदिवासियों के उत्थान के लिए जल्द प्रदेश में पेसा एक्ट लागू किया जाएगा। इस संबंध में राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने भी सोमवार को दो सत्र में चार विभाग के अधिकारियों के साथ चर्चा की और निर्देश दिए कि पेसा एक्ट नियमों को शीघ्र अंतिम स्वरूप दिया जाए। राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने कहा कि पेसा एक्ट (PESA Act) नियमों को शीघ्र ही अंतिम स्वरूप दिया जाए। उन्होंने समय-सीमा तय कर कार्य को पूर्ण किए जाने के निर्देश दिए।

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इस संबंध में राज्यपाल  पटेल पेसा एक्ट के प्रावधानों पर जनजातीय प्रकोष्ठ राजभवन और संबंधित चार विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ चर्चा की और बैठक दो सत्र में सम्पन्न हुई। प्रथम-सत्र में सामाजिक न्याय एवं निःशक्तजन कल्याण और गृह विभाग एवं दूसरे सत्र में पंचायत एवं ग्रामीण विकास और विधि- विधायी कार्य विभाग से संबंधित प्रावधानों पर विचार-विमर्श किया गया। पेसा एक्ट का धरातल पर अमल ही समावेशी समाज निर्माण प्रयासों का आधार है।  जब जागें, तब सवेरा के भाव से कार्य को शीघ्र पूर्ण किया जाए। सबके विश्वास, साथ और प्रयास सफलता का आधार है।

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बता दें कि पेसा कानून को लाने का उद्देश्य आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्व-शासन को मजबूती देना है। देश के 10 राज्यों में पेसा एक्ट अप्रैल 1996 को बनाया गया था और कई राज्यों में यह लागू है, लेकिन छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा में यह पूरी तरह से लागू नहीं है। अब मप्र सरकार इसे लागू करने की तैयारी में है। पेसा एक्ट के तहत स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों की समिति को अधिकार दिए जाएंगे। जिससे अनुसूचित जाति और जनजाति वाली ग्राम पंचायतों को सामुदायिक संसाधन जैसे जमीन, खनिज संपदा, लघु वनोपज की सुरक्षा और संरक्षण का अधिकार मिल जाएगा।

दया याचिकाओं का फास्ट ट्रेक में किया जाए निराकरण

इसके अलावा राज्यपाल मंगुभाई पटेल ने कहा है कि लंबित दया याचिकाओं का निराकरण फास्ट ट्रेक में किया जाना चाहिए। कारावास की अवधि 14 वर्ष की पूर्णता पर राहत प्रावधानों का गतिशीलता और संवेदनशीलता के साथ क्रियान्वयन किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रथम नागरिक के रूप में अधिकारियों से अपेक्षा करते हुए कहा कि व्यवस्था का स्वरूप ऐसा होना चाहिए जिसमें राहत के लिए सुपात्र व्यक्ति को एक दिन भी अतिरिक्त कारावास में नहीं रहना पड़े।

लंबित दया याचिकाओं के संबंध में गृह, विधि-विधायी कार्य एवं जेल विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ राजभवन में चर्चा कर कहा कि राहत याचिका के सुपात्र को रिहाई की निश्चित तिथि आदि की व्यवस्थाओं के दृष्टिगत लंबित नहीं रखा जाना चाहिए। कार्य का भाव और भावना शीघ्रता से राहत प्रदान करना होना चाहिए। दया याचिका के पात्र को राहत प्रावधानों का लाभ लेने के लिए आवश्यक विधिक सहायता उपलब्ध कराने की पहल की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज के विरूद्ध छोटे-मोटे अपराधों पर पुनर्विचार का कार्य समय-सीमा में किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि शासकीय नौकरी सेवा का कार्य है। अधिनियम में प्रभावी कार्रवाई के लिए दिल और दिमाग में पीड़ित के प्रति संवेदना और सहानुभूति होना जरूरी है। संवेदनशीलता के साथ किए गए कार्यों के परिणाम सदैव अच्छे होते हैं।