गांव लौटने के बाद अब मजदूरों के सामने आजीविका की समस्या, बिना काम के कैसे भरे पेट

अलीराजपुर/यतेंद्रसिंह सोलंकी

देश में लॉकडाउन 4 शुरु हो गया है, लेकिन अभी भी देश के किसी ना किसी जगह से मजदूरों के पलायन की खबरें आ ही रही है। जिस भी मजदूर को जैसा साधन मिल रहा है वो वैसे अपने गांव, कस्बें तक पहुंच रहा है लेकिन गांव पहुंचकर भी मजदूर की समस्या खत्म होती नहीं दिख रही है। अपने गांव घर पहुंचकर अब वो भूख का सामना कर रहा है। यहां की बेरोजगारी से परेशान होकर ही उसने बड़े शहरों का रुख किया था, कोरोना संकटकाल में वो अपने गांव तो लौट आया है लेकिन अब यहां रोजगार नहीं मिल रहा। सामान्य स्थिति में ही जब गांवों में रोजी रोटी की समस्या थी तो कोरोना की कठिन परिस्थितियों में तो हालात और बुरे हैं।

मजदूरों ने बाहर जाकर जो काम करके जो पैसा कमाया था वो आने में ही खर्च हो गया है। अब ना इन मजदूरों के पास खुद की जमीन है और ना ही पैसा। ऐसे में सवाल ये है कि यह अपना और परिवार के लोगों का पेट भरे तो कैसे भरें। गुजरात से अलीराजपुर आए मजदूरों का कहना है कि गांव में कोई काम धंधा नहीं है जिससे इन प्रवासी मजूदरों की दिक्कतें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। गांव लौटे इन मजदूरों के सामने खाने का संकट गहरा गया है।

अलीराजपुर के जवानिया गांव के मजदूर सप्ताह भर पहले ही गुजरात से अपने घर लौटे हैं और यह गुजरात में मजदूरी का काम करते थे, लेकिन लॉकडाउन ने इन लोगों का एक बार में ही सब कुछ छीन लिया है। इन मजदूरों का कहना है कि वहां से अपने गांव पहुंच तो गए हैं, लेकिन यहां भी समस्या कम नहीं है। काम नहीं होने की वजह से परिवार का भरण पोषण करना मुश्किल हो गया है। मजदूरों का कहना है कि गुजरात से अपने गांव पहुंचने में हमें ढाई हजार रुपए चुकाने पड़े, तब कहीं जाकर अपने घर पहुंच पाए है। इसके बाद यहां परिवार का पेट पालन एक नई चुनौती बन गया है। मजदूरों का कहना है कि, प्रशासन की ओर से कोई मदद नहीं दी जा रही है और अब वो समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर अपने परिवार का पेट कैसे भरे।

वहीं जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी का कहना है कि अलीराजपुर में करीब 36 हजार मजदूर आ चुके हैं। अधिकतर मजदूर गुजरात में खेती-बाड़ी का काम करते हैं।उन्होंने कहा जो मजदूर बाहर से यहां आए हैं उन्हें मनरेगा और प्रधानमंत्री आवास के तहत काम दिलाए जाने की कोशिश की जा रही है।

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