बालाघाट में हो रहा है महाअनाज-सुपरग्रेन क्विनोवा फसल का उत्पादन

किसानों द्वारा इस नई फसल का उत्साह एवं सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्पादन लिया जा रहा है। आगामी समय में किसानों के लिए यह फसल मील का पत्थर साबित होगी।

बालाघाट, सुनील कोरे| जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर के अंतर्गत संचालित कृषि महाविद्यालय, बालाघाट, मुरझड़ फार्म, वारासिवनी के अधिष्ठाता डॉ. जी.के.कौतू के मार्गदर्शन में बैहर, बिरसा, परसवाड़ा ब्लाकों के चिन्हित ग्रामों नारंगी, भर्री, रेहंगी, लोरा, गुदमा, राजपुर व लगमा के 60 आदिवासी-बैगा किसानों के खेतों में क्विनोवा फसल का प्रथम पंक्ति प्रदर्शन लिया जा रहा है। क्विनोवा परियोजना में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली द्वारा ट्राइबल सब प्लान के अंतर्गत मध्यप्रदेश के ट्रायबल सात जिलों मे वर्षा आधारित धान-पड़ती क्षेत्रो मंे भोजन, पोषण और टिकाउ आजिविका सुनिश्चित करने के लिए चिनोपोडियम क्विनोवा फसल का परिचय एवं विस्तार किया जा रहा है।
किसानों द्वारा इस नई फसल का उत्साह एवं सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ उत्पादन लिया जा रहा है। आगामी समय में किसानों के लिए यह फसल मील का पत्थर साबित होगी। बालाघाट क्विनोवा परियोजना प्रभारी डॉ. उत्तम बिसेन एवं डॉ. शरद बिसेन ने बताया कि जिले की जलवायु, मृदा एवं पानी क्विनोवा फसल के लिए अनुकूल है। इसका परीक्षण गुदमा एवं नारंगी ग्रामों मंे रबी 2018 में 20 आदिवासी कृषकों के यहॉं कम रकबे में प्रथम पंक्ति प्रदर्शन लिया गया था, जो कि सफल रहा। इसे बढ़ाते हुए रबी 2019 में गुदमा, नारंगी, डाबरी, धुनधुनवर्धा ग्रामों में प्रदर्शन लिया गया एवं इस वर्ष बिरसा ब्लॉक के रेंहगी व लोरा गांवों को भी जोड़ा गया है।
क्विनोवा एक बथुआ प्रजाति का पौधा है। इसे रबी मौसम में उगाया जाता है। धान कटाई के उपरान्त खेत में नमी की दशा में 2 किलो प्रति एकड़ की दर से किसी भी प्रकार की मिट्टी में इसका बीज खेत तैयार कर बोया जा सकता है। इसका पौधा 150 से.मी. के लगभग का उंचा होता है एवं इसकी फसल व फुल राजगिरा की फसल समान दिखाई देता है। इस फसल की अवधी लगभग 120-130 दिन की होती है। कम पानी कम लागत में इसकी खेती कर किसान बहुत अच्छा लाभ कमा सकते है। इसकी पत्तियों-डंठलो को बथुआ भाजी के रूप में उपयोग किया जाता है।
वर्तमान में उपलब्ध सभी भाजियों से क्विनोवा की भाजी सबसे ज्यादा पौष्टिक होती है। उन्नत तरीके से खेती करने पर औसतन 15-18 क्विं. उपज प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। क्विनोवा अन्य अनाजों की अपेक्षा बहुत ही पौष्टिक होता है। इसलिये इसे महाअनाज या सुपरग्रेन के नाम से जाना जाता है। क्विनोवा में प्रोटिन कार्बोहाइड्रेट, ड्राइट्री फाइबर, वसा, पोषक तत्व एवं विटामिनों का अच्छा स्त्रोत है। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन ने वर्ष 2013 को क्विनोवा वर्ष घोषित किया था।
शोध से पता चला है कि क्विनोवा में एंटीऑंक्सिडेंट गुण पाये जाते है। जो विभिन्न प्रकार की बीमारी से दूर रखते है। ग्लाइसेमिक इन्डेक्स कम होने के कारण डायबिटिज मरीज के लिए अच्छा माना जाता है, इसके दाने ग्लूटीन से फ्री होते है। अतः गेहूं से एलर्जी वाले लोग इसे खा सकते है। इसके फाइबर में बाइल एसीड होता है। जो कोलेस्ट्रोल को बढ़ने से रोकता है। क्विनोवा में मैग्नेसियम, पोटेशियम, केल्सियम, सोडियम, लोहा, जिंक, मैग्निज, विटामिन ई, विटामिन बी-6, फोलिकअम्ल एवं ओमेगा-3 का मुख्य श्रोत है। इसलिये नासा के वैज्ञानिक इसे लाइफ सस्टेनिंग ग्रेन मानते हुए अपने अंतरिक्ष यात्रियों को क्विनोवा उपलब्ध कराता है। 100 ग्राम क्विनोवा का दाना सेवन करने से 399 किलो कैलोरी उर्जा प्राप्त होती है।
क्विनोवा का उपयोग कैसे करें
क्विनोवा मे सैपोनिन नामक एंटीन्यूट्रीशनल तत्व पाया जाता है। जो बीजों की सतह पर पीलापन लिए हुए चिपका हुआ रहता है। इसे हटाने के लिए दानों को एक से दो घंटे पानी में डुबाकर हाथ से अच्छे से रगड़ने पर यह तत्व हट जाता है, तत्पश्चात क्विनोवा उपभोग के लिए तैयार हो जाता है। आवश्यकतानुसार इसे सीधे या इसका आटा बनाकर उपयोग किया जा सकता है। क्विनोवा से वर्तमान समय में रोटी, पूड़ी, खीर, पुलाव, दही-बड़ा, इडली, लड्डू, पापड़, पराठा, टिक्की एवं सलाद के रूप मे उपयोग किया जा रहा है।
पोषक तत्वों एवं एन्टीआक्सेडेंट गुणों से भरपूर होने के कारण क्विनोवा की समाज के शिक्षित समुदायों व महानगरों में इसकी मांग कुछ वर्षो मे बहुत तेजी से बढ़ रही है। हर क्षेत्र में उपलब्ध न होने के कारण इसकी अमेजान व फिलिपकार्ट जैसी ऐजेंसियों से ऑंनलाईन खरीदी कर उपभोक्ता इसे मंगा कर उपयोग कर रहे है। कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में सैलानियों द्वारा भोजन में इसकी मांग की जाती है। भारत एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसका दाम 150 से 200 रू प्रति किलोग्राम तक है।