मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा छोड़ना बड़ी बात

यशवंत श्रीवास्तव| चंद दिनों पहले ही मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तित हुई है तब से जो लोग अर्श पर थे वह फर्श पर आ गए और जो फर्श पर थे वह अर्श पर पहुंच गए सारे समीकरण अनायास ही बदल गए ऐतिहासिक घटनाक्रम में जिन लोगों का योगदान था उन्हें कोई गद्दार कोई जयचंद के नाम से पुकार रहा है पंजा वाली कांग्रेस कभी भी भारतीय जनता पार्टी की तरह संगठन परख नहीं रही यही कारण है कि यहां जो भी नेता रहे वह अपने अपने क्षेत्र के क्षत्रप बने।इस कारण जो लोग कांग्रेस की राजनीति करते रहे हैं उन्हें इन क्षत्रपों का सहारा लेना पड़ा। श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी कांग्रेस के ऐसे ही क्षत्रप रहे हैं और उन्होंने जिसे आशीर्वाद दिया वह सब नेता विधायक और मंत्री बने।अब प्रश्न उठता है जिन लोगों ने कांग्रेस छोडी उन्होंने पार्टी से गद्दारी की या नहीं।हमारे क्षेत्र की पूर्ब मंत्री इमरती देवी सुमन को लोग अनेक संबोधन से अलंकृत कर रहे हैं पर मैंने उन्हें तब से देखा है जब वह कांग्रेस की ब्लॉक अध्यक्ष थी तब उन्होंने कहा था की महाराज ने बना दिया फिर उन्हें विधायक का टिकट मिला तब भी यही कहा की महाराज की कृपा है भले वह चुनाव अपनी ब्यवहारिकता से जीती हों पर उन्होंने श्रेय सिंधिया को ही दिया जब कांग्रेस की सत्ता आई तो उन्हें भारी भरकम मंत्री पद मिला उसमें भी उन्होंने उसे सिंधिया जी की देन बताया और जब सिंधिया जी ने पार्टी छोड़ने का निर्णय लिया तो कई लोगों ने पार्टी छोड़ी उनमें वह भी एक थीं।
अब प्रश्न उठता है कि व्यक्ति थोड़ा लाभ छोटा पद छोड़ने में कतराता है इन लोगों ने सिंधिया के लिए पद प्रतिष्ठा और वैभव सभी छोड़ दिया।दुर्योधन ने कर्ण को एक छोटे राज्य का राजा बनाया था इसके बदले उसने अपनी जान देना स्वीकार किया पांडव पक्ष में नहीं गया जबकि उसे पता चल चुका था कि वह जेष्ठ पांडव है।कुल मिलाकर कहा जाए तो किसी के लिए सब कुछ दाव पर लगा देना निष्ठा की पराकाष्ठा है इमरती जैसे 22 लोगों का राजनैतिक भविष्य क्या होगा यह तो भविष्य के गर्त में छिपा हुआ है फिर भी उन्होंने महाराज के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाकर यह सिद्ध कर दिया की तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा।यह सब देखते हुए उनके साहस को तो नमन करना ही होगा मान बड़ाई प्रतिष्ठा छोड़ना सहज बात नहीं है रही बात व्यंग बाणों की तो कोई कुछ भी कह सकता है पर सत्ता सुख को छोड़ना अति दुर्लभ कार्य है।