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भोपाल| प्रदेश में 15 साल से राज कर रही भाजपा को सत्ता से बेदखल होने के बाद अब कई खामियाजा भुगतना पड़ रहा है| एक तरफ हार से निराश कार्यकर्ताओं में जोश फूंकना मुश्किल हो रहा है| वहीं पार्टी को फंड जुटाने में भी पसीना छूट रहा है| पार्टी को फंड देने से नेताओं का मोहभंग हो गया है| आजीवन सहयोग निधि के नाम पर ली जाने वाली इस राशि का लक्ष्य 11 करोड़ रुपए है, लेकिन अभी तक बमुश्किल 60 लाख रुपए ही जमा हुए हैं। जबकि, सत्ता में रहने के दौरान पार्टी मार्च के अंत तक इस निधि का लक्ष्य पूरा कर लेती थी। इस बार लक्ष्य से लगभग 94 प्रतिशत कम राशि पार्टी के खाते में आई है।

दरअसल, भाजपा में सांसद-विधायकों को आजीवन सहयोग निधि में हर साल 10000 रुपए जमा करना होता है। इस हिसाब से देखा जाए तो मध्यप्रदेश के 26 सांसद, 109 विधायक और आठ राज्यसभा सदस्यों से लगभग 15 लाख रुपए एकत्रित होना चाहिए, लेकिन अभी तक कई सांसदों-विधायकों ने यह राशि जमा नहीं कराई है। आजीवन सहयोग निधि भाजपा अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों से भी आजीवन सहयोग निधि जुटाती है। इस बार ये लोग भी आनाकानी कर रहे हैं। पार्टी ने आजीवन सहयोग निधि के लिए हर जिले में एक टीम बनाई है। जिसे 31 मार्च से पहले अपने जिले का लक्ष्य पूरा करना है। 2018 में प्रदेश संगठन को लगभग 10 करोड़ और 2017 में लगभग नौ करोड़ रुपए आजीवन सहयोग निधि के रूप में मिले थे। पिछले दिनों राजधानी में पदाधिकारियों की एक बैठक में भाजपा संगठन महामंत्री रामलाल ने साफ कहा था कि अब सरकार नहीं है, इसलिए संगठन के कार्यक्रमों का खर्चा विभिन्न मोर्चें और जिला कार्यकारिणी की टीम स्वयं निकाले। आजीवन सहयोग निधि लक्ष्य से कम हुई तो पार्टी को फंड की कमी रहेगी| 

 

आजीवन सहयोग निधि

आजीवन सहयोग निधि की शुरुआत कुशाभाऊ ठाकरे ने की थी। तब विपक्ष में बैठी भाजपा को संगठन चलाने के लिए पैसे की जरूरत थी। ठाकरे ने पार्टी के पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और पार्टी की विचारधारा से सहमति रखने वालों से आजीवन सहयोग निधि लेकर संगठन चलाने की व्यवस्था की। मध्यप्रदेश से इसकी शुरुआत हुई और बाद में पूरे देश में यह व्यवस्था लागू की गई। अब तक आजीवन सहयोग निधि के मामले में मध्यप्रदेश देश में अव्वल ही रहा है।