धनबल और बाहुबल से प्रत्याशियों को बिठा रही भाजपा : हीरालाल त्रिवेदी

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भोपाल| मध्य प्रदेश के चुनावी संग्राम में प्रमुख राजनीतिक दलों के सामने कई पार्टियां मैदान में हैं| लेकिन सालों से राज करने वाली इन पार्टियों के लिए चुनाव लड़ना आसान नहीं है| सिर्फ जनता को साधना ही नहीं बल्कि चुनावी मैदान में डटे रहना भी चुनौती है| सपाक्स पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हीरालाल त्रिवेदी ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह धनबल और बाहुबल से दूसरे दलों के उम्मीदवारों को उनके पक्ष में बिठाने का काम कर रहे हैं|

त्रिवेदी ने आरोप लगाते हुए कहा मेहगांव में सपाक्स के उम्मीदवार को केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के सामने लाकर जबरदस्ती घोषणा कराई गई। इसी प्रकार बालाघाट में भी  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने एक उम्मीदवार के साथ भी ऐसा ही प्रयास किया। श्री त्रिवेदी ने भाजपा नेताओं की इन करतूतों की निन्दा करते हुए कहा कि इससे भाजपा का असली चेहरा और चरित्र सामने आ गया है। भाजपा वाले प्रदेश में डराने, धमकाने और लालच देकर राजनीति करना चाहते हैं। यह स्वस्थ प्रजातंत्र के लिए अच्छा नहीं है। प्रदेश की जनता आगामी चुनाव में इसका उन्हें अवश्य जवाब देगी।

सपाक्स पार्टी को राजनीतिक दल की मान्यता के खिलाफ याचिका ख़ारिज

मध्य प्रदेश में सपाक्स को भारत निर्वाचन आयोग द्वारा एक राजनैतिक दल के रूप में दी गयीं मान्यता के खिलाफ याचिका को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया है| यह याचिका ललित शास्त्री ने लगायी थी| मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस के सेठ और न्यायाधीश जस्टिस विष्णु प्रताप सिंह चौहान की युगल पीठ  ने अपने आदेश में  कहा  कि भारत निर्वाचन आयोग द्वारा सभी मापदंडों का पालन करते हुए सपाक्स पार्टी का पंजीयन किया गया है और इस पर आपत्ति करने वाली याचिका में कोई ठोस आधार नहीं है| कोर्ट ने कहा कि याचिका में अनावश्यक विवरण की भरमार कर यह कहा गया है कि याचिकाकर्ता सामान्य, पिछड़ा अल्पसंख्यक कल्याण समाज का संस्थापक अध्यक्ष है, जो एक पंजीकृत सोसायटी है| यह कहा गया है कि याचिकाकर्ता सोसायटी एक गैर-राजनैतिक संगठन है, जिसका मकसद शासकीय सेवकों में उनके कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूगता बढ़ाना और उनके सेवा शर्तों के सुरक्षा करना है| इस तथ्य की अनदेखी करते हुए भारत निर्वाचन आयोग ने सपाक्स को एक राजनैतिक दल के रूप में पंजीकृत कर लिया| आरोप यह है कि 06.11.18 को इसे पंजीकृत करने का यह आदेश याचिकाकर्ता द्वारा की गयी आपत्तियों की जाँच किये बिना पारित किया गया और यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विरूद्ध है|