अतिथि विद्वानों के समर्थन में आये दिग्विजय, सरकार को दी नसीहत

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भोपाल। नियमितीकरण की मांग को लेकर अतिथि विद्वानों का धरना जारी है।  हालाँकि इस सम्बन्ध में सरकार फैसला ले चुकी है और वापस लौटने की अपील भी कर चुकी है, लेकिन अतिथि विद्वानों ने सरकार के फैसले को ठुकरा दिया है| इस बीच प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी अतिथि विद्वानों के समर्थन में आ गए हैं| 

अतिथिविद्वान सरकार पर वादअखिलाफ का आरोप लगाते हुए अपने मांगों को लेकर कड़ाके की ठण्ड में डटे हुए हैं| इस बीच टीकमगढ़ के सरकारी कॉलेज में पदस्थ अतिथि विद्वान डॉ समी खरे के असामयिक निधन के बाद अतिथि विद्वानों में आक्रोश है| अतिथि विद्वानों ने आरोप लगाया है कि डॉ समी खरे नौकरी से निकाले जाने के बाद से तनाव में थी। इसी के चलते उनकी आकस्मिक मृत्यु हुई है। इस दौरान अतिथि विद्वानों ने मृतक की शांति के लिए धरना स्थल पर दो मिनट का मौन भी रखा और चंदेल मार्च निकाला| 

समस्या का हल ढूंढें सरकार 

अतिथि विद्वान के निधन और धरना प्रदर्शन को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया है| उन्होंने निधन पर दुःख जताते हुए सरकार को नसीहत भी दी है कि इसका हल ढूंढा जाना चाहिए| उन्होंने लिखा ‘अथिति विद्वान शिक्षक डॉक्टर समी खरे के दुखद देहांत का मुझे दुःख है। मप्र शासन को समस्या का हल ढूँढना चाहिए’।

अतिथिविद्वान नियमितीकरण संघर्ष मोर्चा के मीडिया प्रभारी डॉ जेपीएस चौहान तथा डॉ आशीष पांडेय के अनुसार सरकार द्वारा अब तक लगभग 2700 अतिथिविद्वान साथियों को फालेन आउट करके नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है। इससे पूरे अतिथिविद्वान समुदाय में घोर निराशा, असंतोष, आक्रोश तथा तनाव की स्थिति व्याप्त है। तनाव का आलम यह है कि कई साथी उच्च रक्तचाप व मानसिक व्याधियों से ग्रसित हो चुके है। इसी कारण से दो दिन पूर्व हमारी साथी डॉ समी खरे का असामयिक निधन हो गया। वे लगातार अपने साथियों के सेवा से बाहर होने से सदमे में थी, व अत्यधिक तनाव को वे बर्दाश्त नही कर सकी व ह्दयाघात का शिकार हो गई। 

अतिथि विद्वान नियमितीकरण संघर्ष मोर्चा के समन्वयक डॉ देवराज सिंह का कहना है कि प्रदेशभर के सरकारी कॉलेजों से करीब ढाई हजार अतिथि विद्वानों को नौकरी से निकाल दिया है। इनमें से अधिकांश के पास जीवन यापन का एकमात्र माध्यम नौकरी थी। जिसे भी सरकार ने छीन लिया। ऐसे में यह अतिथि विद्वान तनाव में हैं। सरकार ने इनके नियमितीकरण के लिए कोई कदम उठाना तो दूर जो नौकरी कर रहे थे उनसे भी नौकरी छीन ली है। प्रदेश सरकार की गलत नितियों के कारण अतिथि विद्वान बेहद संकट के दौर से गुजर रहे हैं।

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