भोपाल। गलत को गलत कहना भी जरूरी है… गलत के खिलाफ खामोशी भी उसके समर्थन का हिस्सा कहा जा सकता है… जो जहां है, जिस हालात में है, जिस तरह से अपनी बात उसे कहना चाहिए और यह उसका मौलिक अधिकार भी है और नैतिक दायित्व भी। राजधानी के एक पत्रकार ने एनआरसी और सीएए को लेकर अपनी बात और एतराज को सबके सामने रखने का एक नायाब तरीका खोजा है। पैर में हुए फ्रेक्चर के चलते वे ऑफिस जाकर अपनी खबरें और विचार नहीं रख पाने के हालात को नए अंदाज में पेश करने से भी नहीं चूके। उन्होंने पैर पर चढ़े प्लास्टर को ही अपना संदेश पटल बना लिया और इसी के जरिये वे अपना विरोध दर्ज करवा रहे हैं। फ्रेक्चर पर लिखे एनआरसी और सीएए विरोधी नारों को वे लगातार सोशल मीडिया के जरिये भी लोगों तक पहुंचा रहे हैं। 

राजधानी के पुराने पत्रकारों में एक नाम शाहिद कामिल का भी शामिल है। पिछले दिनों कानपुर यात्रा के दौरान उनके पैर में मोच आई और लापरवाही ने इसको आगे चलकर फ्रेक्चर का रूप दे दिया। कुछ जरूरी पारीवारिक व्यस्तताएं निपटाने के बाद जब उन्होंने अपने पैर का मुआयना कराया तो डॉक्टर ने उन्हें पैर को दो सप्ताह तक प्लास्टर की कैद में रखने की सलाह दे दी और इसको अमलीजामा भी पहना दिया। इसी दौरान देश में एनआरसी और सीएए को लेकर बवाल के हालात बन गए। लेकिन पैर में चढ़े प्लास्टर ने उनके ऑफिस जाने का रास्ता रोक दिया और इसके चलते शाहिद शहर की गतिविधियों और यहां होने वाले प्रदर्शन, धरना, आंदोलन की खबरों से अपने दिल का गुबार निकाल पाने में असमर्थ हो गए। उनके दिल में छिपे ख्यालात को बाहर निकालने का एक आसान रास्ता उन्हेंं जल्दी ही मिल गया। उन्होंने मिजाजपुरसी के लिए आने वाले दोस्त-अहबाब को प्लास्टर पर गेट वेल सून या शीघ्र स्वास्थ कामना के संदेश लिखने की बजाए नए कानून के खिलाफ नारे लिखने की सलाह दी। शुरूआत उन्होंने ही की और अब उनका पैर चढ़ा प्लास्टर नए कानून के खिलाफ संदेश पटल बन गया है। हालांकि उनके मुलाकातियों की बड़ी तादाद ने इस प्लास्टर को छोटा साबित कर दिया है। फिर भी शाहिद खुश हैं कि वे बेड रेस्ट के साथ भी देश के इस अहम दौर में भी अपनी बात सोशल मीडिया के मार्फत लोगों तक पहुंचा पा रहे हैं।

यह रहीम का बंदा, वह राम का भक्त

एनआरसी और सीएए को लेकर जो फैसले आएंगे और जो हालात बनेंगे, वह फिलहाल दूर की कौड़ी है, बावजूद इसके अंग्रेजों वाली फूट डालो सियासत ने अपना असर दिखाना शुुरु दिया है। इसी के चलते यह माना जाने लगा है कि जहां एनआरसी और सीएए ने असर में एक साम्प्रदायिक खाई भी खिंचती दिखाई देने लगी है। इन सब बातों को दरकिनार करती हुई गंगा-जमुनी तेहजीब ने फिलहाल अपना रंग पूरी तरह नहीं खोया है। पैर में दर्द लिए बैठे शाहिद कामिल को इन आराम के दिनों में एक दिली सुकून की प्राप्ति भी हुई है। वे खुश हैं कि उन्होंने अपनी 25 साल की पत्रकारिता में मुहब्बत और भाईचारे के जो फूल बिछाए थे, वे अब भी बदस्तूर खुशबू बिखेरते नजर आते हैं। उनके हालचाल जानने के लिए सुबह से देर रात तक उनके घर पर दस्तक देने वालों में जहां आरिफ मिर्जा या इरशाद शामिल हैं, वहीं अनुराग त्रिवेदी और गौरीशंकर चौरसिया भी शामिल हैं। उनकी जितनी फिक्र अनवर या फराज को है, उससे ज्यादा उनके लिए चिंतित गुरेन्द्र अग्रिहोत्री या आदर्श भदौरिया भी हैं। उनकी खैरियत जानने वालों मेंं सभी धर्म, मजहब और जाति के लोग शामिल होकर उन सब बातों को हवा में उड़ाते नजर आ रहे हैं कि शहर से साम्प्रदायिक सौहाद्र्र के हालात उठने लगे हैं।