सवर्णों को आरक्षण : कमलनाथ के मंत्री-विधायक ने उठाए सवाल

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भोपाल।

लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार द्वारा सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने के फैसले ने देशभर की राजनीति में खलबली मचा दी है। एक के बाद एक नेताओं की इस पर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही है। बीजेपी ने जहां इस फैसला का स्वागत किया है तो विपक्षी दलों ने इसे ‘चुनावी जुमला’ करार दिया है। वही फैसले को लेकर अब मध्यप्रदेश में भी सरगर्मियां तेज हो गई है। कांग्रेस नेताओं ने  इस फैसले को लेकर मोदी की नीयत पर सवाल उठाए है। उन्होंने इस फैसले को समाज मे भेदभाव फैलाने वाला बताया है। हालांकि इस पर बीजेपी नेताओं ने कोई रिएक्शन नही दिया है।

दरअसल, आज  लोकसभा चुनाव के मद्देनजर माेदी कैबिनेट में सवर्णों को आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। यह आरक्षण सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए आर्थिक आधार पर दिया जाएगा। आरक्षण का फायदा उन लोगों को मिलेगा जिनकी सालाना आय 8 लाख रुपए से कम या फिर पास पांच एकड़ तक जमीन है। मोदी सरकार के इस फैसले पर कमलनाथ सरकार में मंत्री ओंकार सिंह मरकाम ने आपत्ति जताई है। मरकाम ने इस फैसले को लेकर मोदी सरकार की नीयत पर सवाल उठाए है। उन्होंने इस फैसले को समाज में भेदभाव फैलाने वाला बताया है। उन्होंने कहा आरक्षण देने के नाम पर समाज और जातियों बांटने की कोशिश हो रही है। ओंकार सिंह मरकाम आदिम जाति कल्याण मंत्री हैं और वो खुद इसी समाज से आते हैं। वही चुनाव के दौरान बीजेपी से कांग्रेस मे शामिल हुए तेंदुखेड़ा से विधायक बने संजय शर्मा ने इसे चुनावी जुमला करार दिया है। उन्होंने कहा है कि लोकसभा चुनाव नजदीक है इसलिए बीजेपी अब आरक्षण की बात कर रही है। पार्टी 3 राज्यों में हार चुकी है, इसलिए वोटरों को रिझाने ये चुनावी जुमला लेकर आई है। 

पीसी शर्मा और राकेश सिंह ने किया फैसले का स्वागत

वही कमलनाथ सरकार में कानून और जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने पीएम मोदी के इस फैसला का स्वागत किया है। उन्होंने कहा है कि मैं खुद सवर्ण हूं। मोदी सरकार का ये फैसला स्वागत योग्य है। इससे देश के कई युवाओं को नौकरी में फायदा मिलेगा। वही भाजपा प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह ने कहा कि सबका साथ सबका विकास बीजेपी का संकल्प है। यह फैसला चुनाव के चलते सरकार ने नहीं किया, बल्कि युवाओं को देखकर लिया गया है।

बता दे कि पिछले साल मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव से पहले सवर्ण आंदोलन शुरू हुआ था। इसका सबसे ज्यादा असर मध्यप्रदेश में देखा गया था। तीनों राज्यों में कांग्रेस को जीत मिली थी। अनुसूचित जाति-जनजाति संशोधन अधिनियम के खिलाफ सवर्ण संगठनों ने सितंबर में भारत बंद भी रखा था। ऐसे में अब लोकसभा चुनाव में भाजपा कोई रिस्क नही लेना चाहती, जिसके चलते यह फैसला लिया गया है।