किस्सा-ए-अच्छे ख़ां और मकई के दाने

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यूँ अच्छे मियां को सनीमा वनीमा का ज़रा शौक़ नहीं…

अच्छे भले आदमी को तीन घंटे अंधेरी सी गुफ़ा में बंद कर दो, उसपे पर्दे का धूम-धड़ाका, शोर-शराबा, गाने-वाने..सीधे अच्छे मियां के दिल में धम-धम बजने लगते। कलेजा मुंह को आ जाता, सिर चकराने लगता,यूं लगता बस गश खाके गिर ही पड़ेंगे। तौबा ये कि बेगम ख़ासी शौक़ीन है सनीमा की…

वो तो फिर भला हो बेगम का जो पिच्चर के बीच उनका हाथ थाम लेती कभी कभार। बेगम को पता है शौहर किस कदर घबराते हैं, इसलिए जो कभी ज़ोर जबरदस्ती ले ही आती तो बीच-बीच में तसल्ली भी देती रहती। यूं बेगम को ऐसी दिलजोई ख़ास पसंद नहीं, लेकिन  सनीमा की शर्त पर कुछ तो करना ही होगा न…

जब भी बेगम फरमाइश करती पिच्चर देखने की,मियांजी आखिरी दम तक टाला करते। लेकिन इस दफ़े तो गजब ही हो गया, अढ़ाई साल से ऊपर हुआ और बेगम ने सनीमा का नाम तक न लिया। तब भी नहीं जब गली-गली में ‘दीदी तेरा देवर दीवाना’ गूंजने लगा..ये फिल्लम इत्ती हिट हुई कि अब तक सारा मोहल्ला देख आया है। इधर बेगम की ना-फ़रमाइश से अच्छे मियां अंदर तक हिले हुए हैं। जाने क्यूं लग रा कि अब ख़ुद ही न ले गए तो अपनी ही पिच्चर खिंच जाएगी जल्दी…

तो अच्छे मियां ने हिम्मत जुटाई और गुल्लन के हाथ दो टिकिट मंगवा ही लिए संगम टाकीज के। टिकिट आते ही बेगम को इत्तिला कर दी..शाम पांच पैंतालीस का शो है, तैयार होकर रहें। नतीजा ये कि पिछले आठ दिन से जो लौकी टिंडे परोसे जा रहे थे सुबहो शाम,उनकी सूरत बदल गई। दोपहर को थाली में कबाब-परांठा था..इतना ही नहीं, ईद पे निकलने वाली काँच की तश्तरी में ज़र्दा भी सजा रक्खा था। यूँ बेगम ने इसरार कर दो परांठे ज़्यादा ही खिला दिए…

शाम को मियां-बीवी की सवारी निकली संगम टाकीज की ओर। ऑटो बुलाया गया और साढ़े पांच बजे वो सनीमा हाल में थे। सालों बाद आए हैं और दिख रा है कि थियेटर का मिज़ाज बदल चुका है। बैठने के लिए गद्देदार सोफे, दीवारों पे रंग-बिरंगी डिजाइन, एसी वाली ठंडक और सबसे ख़ास वो खाने की जगह जहां लाइन लगाकर लोगबाग क्या-क्या चीज़ें खरीद रए हैं। तरह-तरह के खाने की खुशबूएं अच्छे मियां की चटोरी ज़बान को ललचा रही है, लेकिन बेगम के खौफ़ से दिल काबू में किये बैठे हैं…

हाल का दरवाजा खुला तो बेगम को सीट पर बैठा अच्छे मियां ज़रा बाहर को निकल आए। सोच रए हैं क्यूं न कुछ ले ही लें खाने को, कौन रोज़-रोज़ आते हैं यहां। हालांकि बेगम आँखें तरेरेंगी, लेकिन क्या ही कर लेंगी इससे ज़्यादा भरे थिएटर में…

तरह-तरह के खाने हैं स्टाल पे…समोसे, क्रीमरोल,सेंडविच, टिक्का वगैरा तो दिख ही रा है, और भी कित्ती अलग रंग की चीज़ें हैं। लेकिन अच्छे मियां को सबसे ज़्यादा लुभा रई है बड़े-बड़े गोल-चोकोर से डिब्बों में फूली हुई मकई की धानी। क्या तो बोलते हैं उसे अंग्रेजी में..हाँ- पापकार्न। लाल रंग के बिना ढक्कन वाले सुंदर बड़े डिब्बे में ऊपर तक भरके दे रिये हैं, ऊपर से मक्खन भी डाल रए हैं। फिर वो डिब्बा एक टिरे पर रखकर उसमें कागज का नेपकिन और टमाटर केचप भी रक्खा है। तो काफी सोचकर तय किया कि आज ये अंग्रेजी वाला पापकार्न ही खाया जाए। यूँ तो बेगम भी 20 रुपये का मक्का लाती है कभी-कभार और 15 दिन तक धानी फुलाकर खिलाती रहती हैं, लेकिन आज ये मशीन वाला भी खाकर देखा जाए ज़रा। अब इसमें दो फायदे भी है भई, मक्का है तो सबसे सस्ता येई होगा यहां पे, उसपे इत्ता पेल के दे रिये हैं कि पूरी पिच्चर में चल जाएगा एक डिब्बा…

तो लाइन में लग लिये मियां जी। पापकार्न की लाइन में ही भोत भीड़ है ख़ां..लग रा है सब लोग सस्ते और जादा के चक्कर में यहीं आ रिये हैं। काउंटर पे पहुंचे तो विलायती डिरेस वाली लड़की ने कुछ पूछा अंग्रेजी में। अब जादा तो समझ आया नई लेकिन बिग और स्माल लफ़्ज़ सुनकर अच्छे मियां ने बोल दिया बिग। बेगम और वो दो जने हैं तो बड़ा डिब्बा ही ले लिया जाए, कौन बार-बार आते हैं इधर…

पापकार्न का डिब्बा मियां जी के हाथ में पकड़ाते हुए लड़की बोली ‘टू हंड्रेड सेवंटी रुपीज़ सर’..अच्छे मियां को लगा कुछ ग़लत सुन लिया अंग्रेजी में। लड़की से पूछा- कित्ता हुआ बिटिया, फिर जवाब मिला – दो सौ सत्तर रूपये अंकिल…

आज तो थियेटर में जाने से पहले ही सिर चकरा गया..हलक़ सूख गया। कुछ और बोल पाते इससे पहले लड़की ने हाथ में बिल थमा दिया। अब कोई चारा न था, सामान वापिस होना यहां का चलन नहीं और लाइन में शोर बढ़ता जा रा है…

पापकार्न का डिब्बा ले सोफे पर आ बैठे हैं। भीतर जाने से पहले भोत हिम्मत जुटाई पड़ेगी ख़ां। बेगम हर हाल में क़ीमत उगलवा ही लेंगी, और फिर जो घर जाके जो उनकी पिच्चर बनेगी न, सोच-सोच पसीने छूट रिये अच्छे मियां के… 

संगम टाकीज में दो जन की टिकिट एक सौ बीस रूपये, ऑटो से आना-जाना साठ रूपये…कुल जमा एक सौ अस्सी हो रए थे सनीमा के। लेकिन इस ‘टू हंड्रेड सेवंटी रुपीज़’ की वजह से अच्छे मियां के आने वाले कई दिनों पर काला साया मंडराने लगा है। अब हफ्ते चार हफ्ते करेला-लौकी ही नसीब होने है, वो भी बेगम के तानों के साथ…

ख़ूब दिमाग लड़ा रए हैं कि ऐसा क्या करें जो बेगम को क़ीमत न पता चले इस फ़रेबी मकई की। लेकिन ऐसा हो पाना किसी सूरत मुमक़िन नहीं। हारकर चल दिये सनीमा हाल के भीतर अच्छे मियां..पापकार्न की ट्रे पकड़े। यहां पर्दे पे किसी विज्ञापन में गाना बज रहा है – “तुम्हारी नज़र क्यों खफ़ा हो गई, ख़ता बख़्श दो ग़र ख़ता हो गई…”

यूँ बख़्शे जाने की दूर-दूर तक कोई उम्मीद नहीं है….