किस्सा-ए-अच्छे ख़ां..उर्फ़ भूलने का खामियाज़ा

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अलगनी पे कुर्ता टांग बैठक में ढूंढते रहते हैं अच्छे मियां..

बेगम को चाय का बोल रफ़ीक के घर निकल पड़ते..

ऐनक को तो जाने कहां-कहां की सैर करा दी है..

गोया कि अच्छे मियां की याददाश्त धोका देने लगी है, बेगम का तो यही कहना है। पिछले कुछ वक्त से उनकी हरक़ते देख बेगम ने ये नतीजा निकाला है कि अच्छे मियां का बुढ़ापा आ ही गया, छेड़-छेड़ में तो ये ताना अब रोज़ ही देने लगी हैं बेगम… 

पिछले जुमे की ही तो बात है..अच्छे मियां को सब्ज़ी लाने बाज़ार भेजा था बेगम ने। एक तो उनसे कोई भी काम कराना पहले ही मुश्किल, उसपे मंडी जाने को तो हमेशा ही टाला करते। अच्छे मियां से न होता कि पहाड़ के ढेर में से छांट-छांटकर पाव किलो भिंडी चुनें, अब एक-एक भिंडी को टोकरी में डालना कोई कम मेहनत का काम है भला। यही हाल आलू, सेम और बैंगन का भी है। इतने पर भी जब बेगम झोला खोलती तो चार बैंगन में से सवा दो तो सड़े हुए ही निकलते, बस लगा जाती मियां जी की क्लास। इसीलिए भरसक टालमटोल के बाद रवाना हुए अच्छे मियां मंडी की ओर..बेगम ने सख्त ताकीद की कि आध घंटे में घर आ लौटना, रसोई में पकाने को कुछ नहीं है। अच्छे मियां ने बात सुनी और निकल पड़े। इधर उन्हें गए साढ़े चार घंटे से ज़्यादा हो गया, भरी दुपहर जब लौटे अच्छे मियां तो आते ही बोले- खाना लगा दो बेगम, भूख के मारे जान निकल रही है, बस फिर तो जान निकलते-निकलते ही बची मियां जी की। मंडी के लिए निकले अच्छे मियां सब भूलभाल रफ़ीक के यहां जा बैठे थे…

बेगम कई दफ़े कह चुकी कि किसी हकीम को दिखा आओ, तुम्हारी ये भूलने की आदत अब बर्दाश्त से ज़्यादा बढ़ चुकी है, लेकिन अच्छे मियां टालते ही जा रहे। अब अगर किसी आदत या बीमारी के कुछ फायदे भी मिल रहे हों तो भला उसकी दवा क्यों कराएं। जैसे जुमे की ही बात लीजिए, बेगम ने मंडी भेजा ज़रूर था लेकिन वो फंस गए रफ़ीक मियां के दालान में जमी महफ़िल में, अब एक बार जो महफ़िल में जा चुके तो भला निकले कैसे। और उन्हें कौन सा निकलने की पड़ी थी कि रस भरी बातें छोड़ भिंडी चुनने जाएं। लेकिन लौटना तो घर ही था ना..फिर तो लौटने पर इस भूलने की बीमारी के बहाने ने ही जान बचाई जैसे-तैसे…

तय हुआ कि आज शाम बाज़ार जाना है, बेगम के मैके में कोई जलसा है तो कुछ नए कपड़े बनवा लिए जाए। बेगम यूं भी अरसे में घर से निकलती हैं, तो जब भी उन्हें लेकर बाहर जाते अच्छे मियां..पूरा ख़याल रखा जाता उनका। आटो लेकर चौक पहुंचे दोनों, अब ससुराल का मामला है तो ख़रीदारी में भी खास तवज्जो की ज़रूरत है। बेगम के लिए सुर्ख रेशमी कपड़ा कटवाया है, गोटे की दुकान से ढाई मीटर सुनहरी गोटापट्टी ली, मियां जी के लिए आसमानी रंग के कुर्ते का कपड़ा। फिर ससुराल के बच्चों की बारी आई, कम-अज़-कम पंद्रह-सत्रह बाबा सूट ही ले लिये गए, साले साहब के लिए नए ज़माने की टी-शर्ट, बेगम की बड़ी बहन के लिए लाख की चूड़ियां और मोतियों वाला बटुआ। खूब ख़रीदारी हुई, दोनों हाथ झोलों से भर गए। चार झोले अच्छे मियां ने संभाले और दो बेगम ने, लौटते में मियां जी ने इसरार किया कि अब आए ही हैं तो बर्फ का गोला खा लिया जाए। अच्छे मियां जानते हैं कि बेगम को बड़ा पसंद है बर्फ का गोला, यूं वो पहले दो-चार बार इनकार ज़रूर करेंगी लेकिन फिर मान ही जाएंगी। ठेले पर पहुंच अच्छे मियां ने दो गोले बनवाए, बेगम के लिए गुलाब के शरबत वाला मलाई डाल के और अपने लिए खस वाला। खूब चुस्की ले-लेकर खाया मियां जी ने, कुर्ते पर गिरा भी लिया और डपट भी दिये गए…

गोला-प्रकरण के बाद शुरू हुआ असल बारूद-प्रकरण का सिलसिला..बेगम को वहीं ठेले पर बैठा अच्छे मियां चल दिए आटो लाने। आटो के लिये ज़रा बाहर की ओर निकलना पड़ता है, खास बाज़ार में आटो वाले नहीं मिलते। मियां जी बाज़ार पार कर बाहर निकले और चलते-चलते जा पहुंचे बड़ी मस्जिद तक, वहां मिल गए मोहल्ले के ही चंदू चचा, उनकी कपड़े की दुकान है चौक में, उनसे गुफ्तगू में उलझ गए और बात करते करते धुन में उन्हीं के स्कूटर पे बैठ घर आ गए…

अच्छे मियां बेगम को बाज़ार में भूलकर घर आ गए हैं…इसे कुछ ऐसा पढ़िये कि अमेरिका ने ईरान के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है, क्योंकि कुछ देर में यही होने वाला है। घर आकर अच्छे मियां बरामदे में पसर गए। थोड़ी देर में चाय की तलब हुई..बेगम को आवाज़ दी और आवाज़ लगाते ही होश फ़ाख्ता हो गए..अचानक याद आ गया कि बेगम को तो सामान भरे झोलों के साथ चौक में छोड़ आए हैं। घड़ी बता रही है कि घंटा भर से ज़्यादा बीत चुका है, अच्छे मियां ने दौड़ लगा दी है चौक की ओर…

कब चौक गए, कब आटो लिया, कब बेगम को बैठाया, कब घर लौटे..अच्छे मियां को कुछ खबर नहीं…

अब किसी हकीम की ज़रूरत नहीं है, आज घर पर ही अच्छे मियां की भूलने की बीमारी का इलाज हो रहा है…..

-श्रुति कुशवाहा (लेखिका वरिष्ठ पत्रकार है)