किस्साए अच्छे ख़ां उर्फ़ मीठे की मुसीबत

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शक्कर तो खुशखबरी होती है..शक्कर भला बीमारी कैसे हो सकती है…जब पहली बार डॉक्टर ने अच्छे मियां को बताया कि उनके खून में शक्कर ज़्यादा है, वो तो बल्कि खुश ही हुए। बड़े फ़क्र से बोले बेगम से “देख लीजिए हमारे मिज़ाज की मिठास की गवाही खून भी दे रहा”, वो तो डॉक्टर ने वहीं डपट दिया और खरा खरा बोल दिया कि बस अबसे शक्कर बंद…बस तभी से अच्छे मियां के अच्छे दिन भी मानो ताले में बंद हो गए हैं। बेगम तो डॉक्टर से भी सख्त निकली। घर से चुन चुनकर सारी नानखटाई, क्रीम बिस्कुट, चिक्की, पेठे और मिठाई वगैरह आसपास के बच्चों में बांट दी। और जो कुछ रखा भी है तो उसे रसोई की जाली वाली अलमारी में बंद कर छुटकु ताला डाल दिया। अब ये ताला तो अच्छे मियां एक हाथ से तोड़ सकते हैं, लेकिन बेगम का हुकुम भला कैसे तोड़ें…

मीठे के बिना अच्छे मियां कुछ ऐसे हैं जैसे जल बिन मछली, पानी बिन बादल, हरियाली बिन पेड़, जैसे बेगम बिन खुद अच्छे मियां। ज़िंदगी में कोई रस ही नहीं रंग ही नहीं मीठे के बिना। बार-बार उस डॉक्टर को कोसते और किसी न किसी तरह मीठे की जुगत भिड़ाया करते। बेगम ने तो घर में ऐसी इमरजेंसी लगा रखी है कि चाय तक बिना शक्कर वाली दे रही हैं..चाय के रसिया अच्छे मियां को अब चाय का कप किसी ज़हर के प्याले से कम नहीं लगता, लेकिन आखिर वो करें तो करें क्या…

तो कई जुगत भिड़ाई अच्छे मियां ने..कभी शाम को चाय के वक्त बहाने से जुम्मन मियां के घर की तरफ निकल जाते तो उस शाम ढंग की चाय नसीब हो जाती। कभी खुद ही पड़ोस में रहने वाली चार साल की गुड्डो को गोद में उठा लाड़ जताने लगते फिर ज़ोर में बोलकर कि चलो बिटिया को चाकलेट दिला लाए, निकल जाते पास की किराने की दुकान पर। वहां एक चाकलेट गुड्डो को दिलाते और चार खुद के लिये लेते। अब मिठाई की कटौती के दौर में चाकलेट ही उन्हें सोनपपड़ी का स्वाद देने लगी है…

लेकिन लगता है सारा ज़माना ही उनका दुश्मन हो गया है। कल सुबह गुड्डो घर आ गई और अच्छे मियां की गोद में चढ़ मचल उठी चाकलेट के लिए, बस बेगम को माजरा समझने में एक पल भी न लगा। अच्छे मियां को लगता है कि बेगम को पुलिस के खुफिया विभाग में होना चिय्ये था, वो मुजरिम को सूंघकर ही पकड़ लेती। कल का दिन ही मनहूस था, शाम को जुम्मन मियां आ टपके, बेगम ने चाय के साथ उनकी चक्कर की बीमारी की खबर भी परोस दी, बस फिर क्या था जुम्मन मियां ने भी चाय का राज़ खोल दिया…

तभी से बेगम के तेवर गर्म है, जुम्मन मियां के जाने के बाद पहले तो खूब खरी-खरी सुनाई बेगम ने। फिर फरमान जारी कर दिया “अब जो तुमने कहीं भी जाकर धोके से मीठा खाने का सोचा भी तो समझ लो, या तो मेरी जान जाएगी या तुम्हारी”..अच्छे मियां इस धमकी का मतलब खूब अच्छी तरह समझते हैं, जान तो आखिर उनकी ही जानी है…

तो क्या मीठे के बारे में सोचना छोड़ दें..क्या मान लें कि ज़िंदगी से मिठास जा चुकी..क्या बेगम और उस मुए डॉक्टर के आगे हार बैठ। भला ये कर लें तो वो अच्छे मियां कैसे कहलाएं फिर..सो अच्छे मियां के खुराफाती दिमाग ने कुछ और तरकीबें भिड़ाना शुरू कर दी। जैसे- अब किसी आसपास वाले के यहां न जाकर दूर के दोस्त के घर जाएं चाय पीने ताकि बेगम तक खबर पहुंचने की गुंजाईश कम रहे, सब्ज़ी लाने बाज़ार जाएं तो एक दोना जलेबी लेकर वहीं कुछ तलब पूरी कर ली जाए, और जब बेगम सो रही हों तो एकाध चम्मच शक्कर हीं फांक ली जाए उनके इस ज़ुल्म पर मुख़ालफ़त का बिगुल बजाते हुए…

तो अब अच्छे मियां दुपहरी का इंतज़ार किया करते हैं…बेगम ने सारा मीठा भले ही ताले में बंद कर दिया हो लेकिन शक्कर का डिब्बा तो वहीं रखा रहता है। तो जैसे ही दोपहर में बेगम की नन्हे खर्राटों की आवाज़ आने लगती, मियांजी जा पहुंचते रसोई में। शक्कर का डिब्बा खोल चम्मच भर शक्कर यूं खाई जाती जैसे कराची हलवा खा रहे हों। धीरे-धीरे एक चम्मच से दो चम्मच हुई, फिर पता ही न चला कि कब अच्छे मियां मुठ्ठी दो मुठ्टी शक्कर फांकने लगे…

तो क्या इस चोरी की खबर थानेदार को न होती..आज फिर बेगम आरामगाह में जा चुकी हैं, अच्छे मियां अखबार पढ़ने का बहाना बना उनकी गहरी नींद में जाने के इंतज़ार में है। आधा घंटा गुज़रने के बाद मियां जी को लगा कि अब मैदान साफ है तो जा पहुंचे रसोईघर में। वो जादुई डिब्बा खोला और खूब भरकर चम्मच भर शक्कर मुंह में डाल ली.. लेकिन शक्कर डालते ही मुंह से चीख सी निकल गई, पूरा मुंह कसैला हो गया और उगलने ही वाले थे वो ज़हर कि सामने बेगम खड़ी दिखाई दे गई…

कैसा हो जो चोर के सामने यकायक ही थानेदार आ पहुंचे, बस यहीं हुआ अच्छे मियां के साथ..अब उनकी खैर नहीं है, बेगम की लताड़ शुरू हो चुकी है “तुम मुझे बेवकूफ समझते हो, चार दिन से देख रही हूं डिब्बा रोज़ आधा खाली हो जाता है, मैं तो तभी समझ गई थी कि ये कारनामा तुम्हारा ही है इसीलिए आज शक्कर में पाव भर फिटकरी मिला दी, अब ये फिटकरी मिली शक्कर जो तुमने मुंह से निकाली भी न तो यही तुम्हारी जो गत बनेगी वो सोच भी नहीं सकते”

मीठा-मीठा गप कड़वा-कड़वा थू…बचपन में ये कहावत सुनी थी अच्छे मियां ने, लेकिन आज बिल्कुल उलट हो रहा है..शक्कर के नाम पर अच्छे मियां फिटकरी का चूरन निगलने को मजबूर हैं…ये कसैली शक्कर गटकते हुए वो मन ही मन मीठे से तौबा कर रहे हैं…

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