सरकार को घेरने की तैयारी में भाजपा, नेताप्रतिपक्ष ने की विधानसभा सत्र की अवधि बढ़ाने की मांग

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा का शीतकालीन सत्र 17 दिसंबर से शुरू होने जा रहा है। विधानसभा सचिवालय द्वारा सत्र की अधिसूचना जारी कर दी गई है। सत्र 17 दिसंबर से 23 दिसंबर तक चलेगा। सात दिन के सत्र में पांच बैठकें होंगी। विधानसभा की कार्रवाई हंगामेदार होने की पूरी संभावना है| किसानों के मुद्दे पर भाजपा सदन में सरकार को घेरने की तैयारी में है| इस बीच नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने विधानसभा सत्र की समयावधि बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री कमलनाथ को पत्र लिखा है| 

नेता प्रतिपक्ष द्वारा मुख्यमंत्री कमलनाथ को लिखे पत्र में मांग की गई है कि शीतकालीन सत्र की बैठकों की संख्या बढ़ाकर 10 से 12 बैठकें की जाए|   उन्होंने पत्र में कहा है कि विधानसभा का विगत सत्र जुलाई में आहूत किया गया था जिसमें बजट पास किया गया था, इसके बाद प्रदेश में अतिवृष्टि और कई जिलों में बाढ़ के कारण किसानों की फसलें बर्बाद हो चुकी है, इसी विषय को लेकर मेरे द्वारा 16 तारीख को दो दिवसीय विशेष सत्र की मांग की गई थी ताकि बाढ़ पीड़ित और अतिवृष्टि के कारण किसानों की बर्बादी फसलों को तत्काल राहत प्रदान की जा सके|   15 वी विधानसभा को घटित हुए लगभग 11 माह की समय अवधि पूर्ण हो चुकी है इस समय अवधि में प्रदेश में अनेक ज्वलंत समस्या उत्पन्न हुई है लेकिन बजट सत्र के बाद मेरे आग्रह किए जाने के बावजूद किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए विशेष सत्र नहीं बुलाया जा सका, जिसके परिणाम स्वरुप किसानों की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है |

उन्होंने लिखा प्रदेश में कर्ज से परेशान होकर किसान आत्महत्या को मजबूर है बजट सत्र भी तय अवधि के पूर्व ही समाप्त कर दिया गया था किसानों से संबंधित नियम 139 की चर्चा भी नहीं करवाई गई थी| उन्होंने लिखा शीतकालीन सत्र की जो अवधि निश्चित की है इससे यह प्रतीत होता है कि सरकार मात्र पांच दिवसीय अल्प अवधि में सभी शासकीय एवं अशासकीय का निपटा लेना चाहते हैं जो कि व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है | शीतकालीन सत्र में प्रश्नोत्तर स्थगन ध्यान आकर्षण नियम 140 की चर्चा आदि की सूचनाओं सहित अति वर्षा एवं बाढ़ पीड़ित किसानों की समस्याएं एवं प्रदेश के अनेक जनहित के विषय पर व्यापक चर्चा अति आवश्यक है क्योंकि प्रदेश की समस्याओं को उठाने का एकमात्र संवैधानिक विधानसभा ही है|  जिसमें विशेष रूप से विपक्षी सदस्यों को अपने संसदीय कर्तव्यों का निर्वहन का उचित अवसर प्राप्त होता है |

गोपाल भार्गव ने पत्र में लिखा पूर्व की सरकारों में हमेशा यह स्वस्थ परंपरा रही है कि बाकी सत्र की तिथियां और समय अवधि प्रतिपक्ष चर्चा के बाद ही सरकार तय करती थी लेकिन इस परंपरा का भी सरकार के द्वारा पालन नहीं किया जा रहा है जबकि सदन को सुचारू रूप से सौहार्दपूर्ण वातावरण में चलाने के लिए परंपरा को अनवरत बनाए रखना एवं विपक्ष को विश्वास में लेकर चले जाना आवश्यक है|