महासंग्राम: मालवा-निमाड़ की सीटों पर आज प्रचार का आखिरी दिन, सभी लगाएंगे ऐड़ी-चोटी का जोर

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भोपाल।

लोकसभा चुनाव अपने अंतिम पड़ाव में पहुंच चुका है। 19  को एमपी में चौथे चरण की वोटिंग होना है, प्रचार का आज आखिरी दिन है।इसके बाद डोर टू डोर कैंपेन किया जाएगा। आखरी दौर में बीजेपी-कांग्रेस दोनों की नजर मालवा निमाड़ की आठ सीटों पर है, इसके लिए दिग्गज पहले ही अपने पूरी ताकत झोंक चुके है। हाल ही मं कांग्��ेस की तरफ से राहुल-्प्रियंका और बीजेपी की तरफ से मोदी-शाह ने रैली, सभा और रोड शो किया और धुंआधार प्रचार किया था। यह मुकाबला अब महासंग्राम में बदल चुका है, जिसमें ना सिर्फ प्रत्याशियों बल्कि दिग्गजों की साख भी दांव पर लगी हुई है।

               विधानसभा चुनाव 2018 में भाजपा को सर्वाधिक नुकसान मालवा-निमाड़ क्षेत्र में हुआ था। यहां की 66 सीटों में से लगभग 56 सीटें भाजपा के पास हुआ करती थीं, जो आधे से भी कम पर सिमट गईं। खासतौर से मजबूत जनाधार वाले आदिवासी बेल्ट धार, खरगोन, झाबुआ में भी भाजपा को भारी शिकस्त मिली थी। अब लोकसभा चुनाव में भाजपा कोशिश कर रही है कि मालवा-निमाड़ में भाजपा का जनाधार वापस लाया जा सके। हालांकि वर्ष 2014 में भाजपा ने मालवा-निमाड़ की ये सभी सीटें जीतकर इतिहास बनाया था।जहां विधानसभा चुनावों में मिली सफलता से उत्साहित कांग्रेस कम से कम चार सीटें जीतने की उम्मीद कर रही है। वहीं, भाजपा मोदी के दम पर पिछला नतीजा दोहराने का दावा कर रही है। इसी के चलते प्रचार के आखिरी दिन शुक्रवार को पीएम मोदी मध्य प्रदेश के रण में उतरेंगे। मोदी आज खरगौन में रैली को संबोधित करेंगे और विपक्ष का जोरदार घेराव करेंगें।हालांकि यहां राहुल पहले ही सभा कर चुके है।

इन सीटों पर कांग्रेस-बीजेपी के बीच महामुकाबला

इंदौर लोकसभा सीट

मप्र की व्यावसायिक राजधानी इंदौर संघ का गढ़ है। लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने 1989 से जीत का जो सिलसिला शुरू किया, वह 30 साल से कायम है। ताई के नाम से मशहूर सुमित्रा इस बार रण में नहीं हैं। ताई के इनकार के बाद भाजपा ने पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान की पसंद व इंदौर विकास प्राधिकरण के चेयरमैन रहे शंकर लालवानी को उतारा। कांग्रेस ने पंकज संघवी को फिर मौका दिया है। संघवी सीएम कमलनाथ और पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह की पसंद हैं। लोकसभा, विधानसभा और महापौर का चुनाव हार चुके संघवी का यह आखिरी चुनाव है। उन्हें भाजपा की अंदरूनी खटपट का फायदा मिल सकता है। भाजपा के बड़े नेताओं से उनके निजी संबंध लाभ पहुंचा सकते हैं। वहीं, कांग्रेस के लिए भी गुटबाजी बड़ी चुनौती है।हालांकि आखरी दौर में हुए प्रियंका गांधी के रोड शो के बाद से मुकाबला रोचक हो गया है।यहां की आठ में से कांग्रेस और भाजपा दोनों के पास चार-चार सीटें हैं।

देवास लोकसभा सीट

अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित देवास सीट पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ने नए चेहरे उतारे हैं। कांग्रेस ने पद्मश्री और कबीरपंथी भजन गायक प्रहलाद सिंह टिपानिया पर दांव लगाया है तो भाजपा ने पूर्व जज महेंद्र सिंह सोलंकी को मैदान में उतारा है।  सोलंकी को भाजपा में बाहरी माना जा रहा है। कांग्रेस के प्रह्लाद टिपानिया भी गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि से हैं। पद्मश्री टिपानिया कबीर के भजनों को गाने के लिए प्रसिद्ध हैं। कांग्रेस को उनकी लोकप्रियता का लाभ मिल रहा है।  2008 में बनी इस संसदीय सीट पर 2009 के चुनाव में कांग्रेस के सज्जन सिंह वर्मा ने जीत हासिल की थी। उन्होंने थावरचंद गहलोत को हराया था। 2014 में मोदी लहर में भाजपा के मनोहर ऊंटवाल ने यह सीट छीन ली थी। देवास सीट के तहत आठ विधानसभा सीटें आती हैं, जिनमें से चार कांग्रेस और चार भाजपा के पास है।

उज्जैन लोकसभा सीट

 महाकाल की नगरी उज्जैन में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है। भाजपा ने सांसद चिंतामणि मालवीय की जगह इस बार अनिल फिरोजिया को मैदान में उतारा है। कांग्रेस ने बाबूलाल मालवीय को मैदान में उतारकर लड़ाई को दिलचस्प बना दिया है। यहां की आठ विधानसभा सीटों में से पांच पर कांग्रेस का कब्जा है और तीन पर भाजपा का।

मंदसौर लोकसभा सीट

मंदसौर लोकसभा सीट से भाजपा ने मौजूदा सांसद सुधीर गुप्ता को फिर से मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस ने एक बार फिर मीनाक्षी नटराजन पर ही भरोसा जताया है। 2014 में इन्हीं दोनों नेताओं के बीच सियासी जंग हुई थी और सुधीर गुप्ता ने नटराजन को करीब तीन लाख मतों से मात दी थी। विधानसभा चुनाव के लिहाज से देखें तो मंदसौर संसदीय सीट के तहत आठ विधानसभा सीटें आती हैं, इनमें से सात भाजपा और एक कांग्रेस के पास है।ऐसे में दोनों का साख दांव पर है, चुनाव जीतना दोनों के लिए चुनौती बना हुआ है।

खंडवा लोकसभा सीट

खंडवा में दोनों पार्टियों के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष फिर आमने-सामने हैं। भाजपा से मौजूदा सांसद नंदकुमार चौहान तो कांग्रेस से अरुण यादव मैदान में हैं। पार्टी के भीतर एक खेमा नंदकुमार के विरोध में है। पूर्व मंत्री अर्चना चिटनीस विधानसभा चुनाव की शिकस्त भूल नहीं पा रही हैं। अरुण को भाजपा की कलह से ताकत मिल रही है। उनके भाई कमलनाथ सरकार में मंत्री हैं।  2014 में मोदी लहर में चौहान ने अरुण यादव को तीन लाख से ज्यादा मतों से हराया था। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा ने चार-चार सीटों पर जीत दर्ज की है। ऐसे में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे का मुकाबला

खरगोन लोकसभा सीट

खरगोन में मौजूदा सांसद सुभाष पटेल की जगह गजेंद्र पटेल को उम्मीदवार बनाया है। सुभाष की नाराजगी भाजपा के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है। वहीं, कांग्रेस के डॉ. गोविंद सिंह मुजालदा नया चेहरा हैं।  2014 में भाजपा के सुभाष पटेल ने करीब ढाई लाख मतों से जीत हासिल की थी। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस इस इलाके में बड़ी सेंध लगाने में कामयाब रही है। यहां की आठ विधानसभा सीट में से छह सीटें कांग्रेस ने जीती थ। जबकि महज एक सीट भाजपा और एक सीट पर निर्दलीय ने कब्जा जमाया था।

रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट

आदिवासी बहुल क्षेत्र है। पांच लोकसभा चुनाव जीत चुके कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया, भाजपा विधायक जीएस डामोर के खिलाफ कड़े संघर्ष में हैं। डामोर ने विधानसभा चुनावों में कांतिलाल के बेटे विक्रांत को हराया था। डामोर कहते हैं, अब पिता की बारी है।2014 में मोदी लहर में भाजपा के दिलीप सिंह भूरिया यहां से सांसद चुने गए थे, लेकिन एक साल बाद ही उनका निधन हो गया और बाद में हुए उपचुनाव में कांतिलाल भूरिया भाजपा से यह सीट छीनने में कामयाब रहे। रतलाम-झाबुआ संसदीय सीट के तहत आठ विधानसभा सीटें आती हैं। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में इन आठ में से पांच कांग्रेस और तीन भाजपा ने जीती थी।

धार लोकसभा सीट

धार सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। इस सीट पर भाजपा ने सावित्री ठाकुर का टिकट काटकर छतरसिंह दरबार को उतारा है। कांग्रेस से दिनेश गिरवाल चुनावी मैदान में हैं। वे भील हैं और कहा जाता है कि धार से भिलाला आदिवासी ही जीतता है।  जय युवा आदिवासी शक्ति ‘जयस’ के कारण विधानसभा चुनाव के बाद से इससीट पर समीकरण बदल गए हैं। यहां आठ विधानसभा सीटों में से छह कांग्रेस और दो पर भाजपा का कब्जा है। भाजपा पूरी कोशिश कर रही है कि यहां अपना कब्जा बरकरार रख सके।