मिशन 2019 : भाजपा के इन सांसदों पर मंडरा रहा हार का खतरा, नए चेहरों की तलाश!

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भोपाल। आगामी लोकसभा चुनाव में बीजेपी से टिकट लेने वाले नेताओं की दौड़ शुरू हो गई है। वर्तमान में प्रदेश की 29 सीटों में से 26 सीटों पर बीजेपी के सांसद हैं। खबर है कि इस बार प्रदेश में जिन विधानसभा क्षेत्रों में चुनावों के दौरान सांसदों की परफॉर्मेंस खराब रही उन सांसदों का टिकट कट सकता है। आधे से ज्यादा सांसदों पर हार का खतरा मंडरा रहा है|  जिसके चलते पार्टी उनका टिकट काट सकती है या दूसरी सीट से चुनाव लड़ा सकती है|  पार्टी के डेढ़ दर्जन से सांसदों की अपने क्षेत्र में स्तिथि ठीक नहीं है। यह नेता अपनी लोकप्रियता कायम नहीं रख पाए। जिसके चलते उन नेताओं पर जीत का भरोसा कम हुआ है, जिससे पार्टी में दमदार चेहरे के तलाश तेज हो गई है| पार्टी विधायकों को उतारने से बच रही है ऐसे में कम अंतर् से विधानसभा चुनाव हारे नेताओं को मौक़ा मिल सकता है| 

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के सर्वे रिपोर्ट के फीडबैक में भी सामने आया है कि मध्यप्रदेश में उसके 18 सांसदों की स्थिति खराब है। अभी मध्यप्रदेश में भाजपा के 26 सांसद हैं, जबकि कांग्रेस के पास तीन सांसद ही हैं। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद भी एमपी में संभावनाएं देखी जा रही हैं, भाजपा के अंदरखाने कोशिश हो रही है कि यहां पर कम से कम 20 से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज की जाए। यही वजह है कि पहले उत्तर प्रदेश के मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह को चुनाव प्रभार दिया गया और अब उनके अलावा अनिल जैन को भी मध्यप्रदेश का जिम्मा दिया गया है। अनिल जैन को अमितशाह का करीबी माना जाता है और अब स्वतंत्रदेव सिंह उनको रिपोर्ट करेंगे और प्रत्याशी चयन को लेकर सही फीडबैक आलाकमान तक पहुचायेंगे | विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी के रणनीति में बदलाव हुआ है| एट्रोसिटी एक्ट सवर्ण आंदोलन, जीएसटी जैसे तमाम मुद्दों पर सरकार का रुख बदला है| केंद्र सरकार सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण लागू कर चुकी है, इसको पार्टी चुनाव में भुनाएगी| वहीं बजट की घोषणाओं को भी बीजेपी आधार बनाकर मैदान में उतरेगी| प्रत्याशी चयन से पहले वर्तमान सांसदों के अंतिम समय के फीडबैक के बाद टिकट पर फैसला होगा| फिलहाल जिन सांसदों पर हार का खतरा मंडरा रहा है उन सीटों पर पार्टी विचार कर रही है| 

कट सकते है इन सांसदों के टिकट

मुरैना सांसद अनूप मिश्रा

मुरैना—श्योपुर लोकसभा सीट पर भाजपा को विधानसभा चुनावों के दौरान भारी नुकसान झेलना पड़ा है। मुरैना की सभी सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा है। एट्रोसिटी एक्ट यहां पर बड़ा मुद्दा है, ऐसे में अनुप मिश्रा का लगातार क्षेत्र से दूरी भी एक मसला बनकर खड़ा हुआ है। इसके साथ ही अभी भितरवार सीट पर मिली हार के बाद उनका दावा भी कमजोर हुआ है।

भिंड सांसद भागीरथ प्रसाद

कांग्रेस के प्र्त्याशी घोषित होने के बाद पार्टी छोड़कर पिछले चुनाव में भाजपा में शामिल हुए। चुनाव जीते, लेकिन क्षेत्र से लगातार दूरी होने के कारण स्थानीय विरोध बना हुआ है। भाजपा कार्यकर्ता ही विरोध कर रहे हैं। उनकी एलीट छवि ने पार्टी को यहां पर नुकसान पहुंचाया।

सागर से लक्ष्मीनारायण यादव

खुद के बेटे को सुरखी सीट से नहीं जिता पाए। इसके साथ ही क्षेत्र में निष्क्रियता भी एक बड़ा मुद्दा है। ऐसे में यहां पर चेहरा बदलना तय है। स्थानीय कार्यकर्ता भी इनका विरोध कर रहे हैं।

टीकमगढ़ से वीरेंद्र खटीक

केंद्र सरकार में मंत्री होने के बाद भी क्षेत्र में कोई विकास नहीं कर सके। लो प्रोफाइल नेता होने के बाद भी स्थानीय लोगों को उपलब्ध नहीं होते हैं। क्षेत्र में सक्रियता का अभाव है। यही कारण है कि बुंदेलखंड के लोगों में सांसद को लेकर नाराजगी है।

खजुराहो से नागेंद्र सिंह

नागेंद्र सिंह अभी हाल में हुए विधानसभा चुनावों में विधायक बनकर वापस विधानसभा पहुंच गए हैं। ऐसे में उनकी टिकट की दावेदारी कमजोर मानी जा रही है। लेकिन जो रिपोर्ट आई है, उसमें नागेंद्र सिंह की हालत भी स्थानीय लोगों में खराब आई है। सर्वे के मुताबिक नागेंद्र सिंह अपनी लोकसभा सीट में कमजोर प्रत्याशी बनकर उभरेंगे।

सतना से गणेश सिंह

स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी। लोगों से दूरी सबसे बड़ी वजह

सीधी से रीति पाठक

हाई—प्रोफाइल स्टाइल सबसे बड़ी वजह, जिसके चलते कार्यकर्ताओं से दूरी हो गई है। स्थानीय लोगों का विरोध भी एक बड़ा कारण।विधानसभा चुनाव में भी विरोध का सामना करना पड़ा।

शहडोल से ज्ञान सिंह

भाजपा पर दबाव बनाकर उपचुनाव में सांसद बने थे। सांसद बनने को लेकर मन से तैयार नहीं थे और यही वजह रही कि इन्होंने इलाके में काम नहीं किया और उसका नुकसान यह है कि इनकी दावेदारी कमजोर हो गई है और स्थानीय स्तर पर इनका समर्थन कम हुआ है।

मंडला से फग्गन सिंह कुलस्ते

आदिवासी चेहरा, लेकिन बड़े नेता होने के बाद भी काम नहीं करना मुश्किल बन रहा है। भोपाल से लेकर दिल्ली तक पहुंच होने के बाद भी इलाके में इसका प्रभाव नहीं दिखा पाए।

बालाघाट से बोध सिंह भगत

कमलनाथ का इलाका, यहां पर कभी बोध सिंह मजबूत नेता के तौर पर जाने जाते थे, लेकिन अबकी दफा उनकी जमीन खिसकती नजर आ रही है। उन्हें स्थानीय विरोध के चलते कमजोर उम्मीदवार के तौर पर देखा जा रहा है।

राजगढ़ से रोडमल सिंह नागर

इस सीट पर कांग्रेस की ओर से दिग्विजय सिंह के परिवार से कोई उम्मीदवार मैदान में उतरेगा। ऐसे में नागर कमजोर प्रत्याशी के तौर पर देखे जा रहे हैं। यही वजह है कि पार्टी इनके टिकट काटने पर विचार कर रही है।

देवास से मनोहर उंटवाल

विधायक का चुनाव जीतकर किनारे हो गए हैं। लेकिन पूरी लोकसभा सीट पर भाजपा को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। ऐसे में पार्टी इनके नाम को किनारे करने पर विचार कर रही है। नए चेहरे की तलाश हो रही है।

उज्जैन से चिंतामणि मालवीय

भाजपा के बड़बोले सांसद हैं। लेकिन स्थानीय स्तर पर कमजोर होती पकड़ के चलते पार्टी की पसंद से उतरते नजर आ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर गुटीय राजनीति में फंसकर कमजोर हुए हैं।बयानों को लेकर भी कई बार सुर्खियों में रहे ।

मंदसौर से सुधीर गुप्ता

पहली बार टिकट मिला, मीनाक्षी नटराजन को हराकर लोकसभा के भीतर आए। लेकिन उसके बाद इलाके में पकड़ बनाने में कमजोर साबित हुए। स्थानीय विरोध एक बड़ी वजह।

धार से सावित्री ठाकुर

भाजपा को स्थानीय स्तर पर नुकसान झेलना पड़ा है। सांसद का प्रभाव कमजोर हुआ है। पहली बार सांसद बनी थीं लेकिन उस प्रभाव को बरकरार रखने में कामयाब नहीं रहीं।

भोपाल से आलोक संजर

भोपाल जैसी सुरक्षित सीट से सांसद बने थे। इस बार गुटीय संतुलन के चलते कमजोर हुए हैं। पूरी संसदीय सीट पर प्रभाव छोड़ने में कामयाब नहीं रहे। मूलभूत सुविधाएं पूरी ना करने के चलते जनता में नाराजगी।विधानसभा चुनाव में इसका असर देखने को मिला।

बैतूल से ज्योति धुर्वे

काम से ज्यादा विवादों में रहीं, जिसके चलते प्रभाव कमजोर हुआ है। स्थानीय स्तर पर संगठन और कार्यकर्ताओं से दूरी भी एक बड़ी वजह है।जाति वाला मामला अब भी शांत नही हुआ है।

खंडवा से नंदकुमार सिंह चौहान

पूर्व प्रदेश अध्यक्ष होने के बाद भी स्थानीय गुटीय राजनीति को पोषण देने के कारण अब खुद ही कमजोर नजर आ रहे हैं। पार्टी मानकर चल रही है कि वापस टिकट देने से दूसरे लोग ही भितरघात करेंगे, ऐसे में पार्टी को नुकसान होगा।विधानसभा चुनाव के दौरान बयानबाजी भी हावी रही , जिसका भारी नुकसान हुआ।