मस्जिदों, ईमाम-मोअज्जिन के इदारे में लागू हुआ गैर शरई ड्रेस कोड!

भोपाल। खान अशु।

प्रदेश के इकलौते और देश के दूसरे नंबर के कजियात और मस्जिदों की देखरेख करने वाले इदारे में पाश्चात्य यूनिफार्म की अनिवार्यता आयद कर दी गई है। कुर्ता-टोपी पहने आने वाले भोपाल रियासत के ईमाम-मोअज्जिन और मस्जिदों के खैरख्वाहों के बीच अलग दिखाई देने की कवायद में यह फरमान मसाजिद कमेटी ने जारी किया है। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री आरिफ अकील की अकलियत के लिए की जाने वाली फिक्र के बीच मसाजिद कमेटी ओहदेदारों की यह तजवीज लोगों के गले उतरते नजर नहीं आ रही है।

भोपाल, रायसेन और सीहोर जिलों की मस्जिदों की देखरेख और इनके ईमाम-मोअज्जिन की तंख्वाह से संबंधित जिम्मेदारियां निभाने वाले इदारे मसाजिद कमेटी ने अपने कर्मचारियों के लिए ड्रेस कोड लागू कर दिया है। इस नए फरमान में कर्मचारियों को नीले और हरे रंग का पेंट-शर्ट, बेल्ट और बैज लगाने के निर्देश दिए गए हैं। नई व्यवस्था के पीछे मंशा मसाजिद कमेटी कर्मचारियों की अलग-थलग पहचान होना बताया जाता है। लेकिन कमेटी कार्यालय में मौजूद ज्यादातर मजहबी कर्मचारियों के लिए लागू किए गए इस ड्रेस कोड को लेकर एतराज के स्वर भी सुनाई देने लगे हैं। कर्मचारियों का मानना है कि उनके कामकाज और यहां आने-जाने वाले मजहबी लोगों के बीच इस तरह का पैंट-शर्ट पहनकर आना कुछ अलग-थलग लगने जैसा महसूस हो रहा है। गौरतलब है कि कमेटी में पदस्थ अधिकांश कर्मचारी ब-शरा होकर दाढ़ी-टोपी का अहतमाम भी करते हैं और नमाजों की पाबंदी भी इनकी आदत में शुमार है। ऐसे में पेंट-शर्ट व्यवस्था इनके लिए कुछ नया और संकोच पैदा करने जैसा है। 

नवाबकाल से है व्यवस्था

मसाजिद कमेटी की व्यवस्था मर्जर एक्ट के तहत लागू की गई है। रियासत मर्ज होते समय तात्कालीन नवाबों ने यहां की मस्जिदों की व्यवस्था सरकार द्वारा उठाए जाने का मसौदा किया था। इसी लिहाज से अब तक सरकारों द्वारा मुआवजे के रूप में एक निश्चित राशि मसाजिद कमेटी को दी जाती है, जिससे रियासत भोपाल की मस्जिदों के ईमाम-मोअज्जिनों की तन्ख्वाह का वितरण होता है। कमेटी में होने वाली सियासी नियुक्तियों के दौरान इस बात को दरकिनार करते हुए यह माना जाता रहा है कि सरकार से मिलने वाले अनुदान के चलते यह इदारा भी सरकारी उपक्रम की श्रेणी में आता है।

ईमाम-मोअज्जिनों के बीच अलग नजर आएंगे कर्मचारी

मसाजिद कमेटी में सबसे ज्यादा आमद-ओ-रफ्त रियासत भोपाल की मस्जिदों के ईमाम-मोअज्जिनों की है। इसके अलावा इसी कमेटी से जुड़े हुए दारुल कजा-इफ्ता में काजी, मुफ्ती और दीगर उलेमाओं की मौजूदगी भी होती है। इधर यहां अपने निकाह, तलाक, शरई मसलों की जानकारी, फतवे आदि के लिए आने वाले लोग भी मजहबी होते हैं और इनका पहनावा भी शरई होता है। ऐसे में कर्मचारियों के लिए लागू किए गए ड्रेस कोड की वजह से कमेटी के मुलाजिम सबसे अलग ही नजर आने वाले हैं।

मंत्री की मंशा पर गिर रही गाज

तत्कालीन अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री चूंकि मुस्लिम समुदाय से ही ताल्लुक रखते हैं और इस विभाग को संचालित करने का उनका पूर्व अनुभव भी है, ऐसे में वे अपनी नियुक्ति के समय से ही मुस्लिम इदारों के लिए खास फिक्रमंद रहे हैं। उनके कार्यकाल में पहली बार प्रदेश हज कमेटी और मसाजिद कमेटी सियासी चेहरों की बजाए दीनी और आलिमों की नियुक्तियां की हैं। जहां मसाजिद कमेटी में एक ईमाम अध्यक्ष की कुर्सी पर मौजूद हैं, वहीं हज कमेटी में कई उलेमाओं की मौजूदगी है। बावजूद इसके इन इदारों से भी मंत्री की मंशा के मुताबिक काम नहीं हो पा रहे हैं।