लॉकडाउन डिस्टेंसिंग के दौर मे दूरिया मिटाता सोशल मीडिया

भोपाल।

लॉक डाउन के बीच एमपी के एक पीडब्ल्यूडी अधिकारी रीतेश शर्मा ने लॉक डाउन पर एक छोटी सी स्टोरी  लिखी है।

वाट्सअप तेरा आधा शुक्रिया ( लॉक डाउन का 17वा दिन)

न जाने क्यों आज व्हाट्सएप और फेसबुक का शुक्रिया अदा करने का जी चाह रहा है क्योंकि इस लॉक डाउनलोड दूरियों को और बढ़ा दिया है तब ऐसे समय में व्हाट्सएप ही सहारा है और मैं समझता हूं कि लव टाउन उतना बुरा नहीं लग रहा जितना व्हाट्सएप और फेसबुक के ना होने पर लगता लोगों ने अब अपनी संवेदना हो को व्यक्त करने का एक अच्छा जरिया बनाया हुआ है इसमें वह अनजाने लोग भी हैं जिनसे सीधा कोई वास्ता नहीं लेकिन फिर भी आपके सुख और दुख में बराबर से साझेदार है बहुत पहले जब तू नही था तो इंतज़ार का अपना मज़ा था ,बात करने की और मिलने की चाहत बरकरार थी , कानो में रस घुल जाया करता था जब किसी अपने की आवाज़ आती थी, आज सिर्फ शब्द आते है , जिसमे चाहत ओर भावनाएं तो होती है पर महसूस नही होती, ये लिखे हुए सफेद पे काले शब्द में एहसास थोड़े कम होते है , दीवाली हो या होली का बात उस समय की है जब हम ग्वालियर में थे , औऱ अपने युवा ओर बाल अवस्था के गोल्डन एरा में थे , उस वक़्त त्यौहार में अक्सर सभी दोस्तो ओर रिश्तेदारों से मिलने जाया करते थे , कुल मिला के आठ घर होते थे , जहाँ पर बारी बारी से मिलने और बड़ो का आशीर्वाद लेने जाया करते थे । तब घर-घर पे जाना एक परम्परा ओर सामाजिक लगाव हुआ करता था । पर आज सब वक़्त की भेंट चढ़ गया है , मिलने मिलाने ओर बात करने का ये चलन अब धीरे धीरे वट्सअप ओर FB की भेंट चढ़ गया है और बस आभासी दुनिया मे खुद को समेट लिए है । “जिसे भी देखो सब अपने आप मे गुम है” ये गीत की पंक्तिया आज के परिवेश में कितनी फिट है । दीवाली की रात मेरा शहर मानो दुल्हन बन जाया करता था, इस बार की दिवाली में जब रात यू ही दिल न माना तो अपने शहर को देखने और पान खाने के बहाने निकले , तो बरबस निगाहें कुछ बाइक सवारों पे घूम गयी , रास्ते मे कुछ युवा लड़के शैदाई बने मोटर साईकल पे हवा से बातें करते हुएऔऱ सड़क पे स्टंट करते बेतरतीब से घूम रहे थे, कुछ पान की दुकान पे , कुछ चौराहे पे खड़े थे …..

बरबस अपना वक़्त याद आ गया जैसे कल की ही बात हो , जब लक्ष्मी पूजा के बाद बड़ी जल्दी होती थी दोस्तो के पास जाने की, ओर पापा मम्मी के लाख मना करने पर भी निकल जाते थे, चंद लगोटिया यारो के साथ बाइक पे एक राउंड शहर का लागते थे, सराफा , बाड़ा, मंडी, जनक गंज न गए तो क्या किया ,और एक दो घर तो उसी दिन निपटा देते थे , ये मिलन कार्यक्रम धनतेरस ( ये दिन हमारे शहर का सबसे रौनक वाला होता था, सारा शहर उमड़ जाता था ) से ही शुरू हो जाते थे, हमे याद है घूमने के बाद सबका एक जगह डिनर होटल पे ही होता था , गप शप लगाते फब्तियां कसते हुए वो सहभोज तो तमाम व्यंजन से कही जियादा लज़ीज़ लगता था , कई बार तो वही पुरानी कोई बात पर झगड़ भी लेते थे , यही था सच्चा सेलेब्रेशन तब वट्सअप नही था । मज़े की बात तो यह कि ….कुछ खास घर तो जाना जैसे प्रोटोकॉल था .. उफ्फ वो सखियों के घर …… जाके बाइक का हॉर्न बजा के आना और , वो निकले तो ठीक वरना ठीक घरवाले निकले इससे पहले ही कट लेना , क्या रोमांच था , ग्वालियर के सराफे की रौनक दिवाली के दिनों मेले सी हो जाया करती थी , सारा शहर आता था, सब लड़को के इंतज़ार यही खत्म हो जाते थे , सबकी वाली ☺️ के दर्शन भी हो ही जाते थे ,उस वक़्त मोबाइल आये नही थे, इंतज़ार ही सबसे प्यारा था , पर ये सब आज बड़ा सालता है । दोस्त के घर ढोली बुआ का पुल जाने के पहले बाड़ा का चक्कर जनकगंज की रोड मित्र का घर पुराना, ओर खासकर दोस्त जिनके यहां के यहाँ ताश के सबसे फड़ लगते थे दीवाली पे खेलने नही देखने में मज़ा आता था …. यार ,सब पीछे छूट गया । दीवाली अब दीवाली नही लगती , होली पे भी रंग अब बड़े फीके से होते जा रहे है, अब पीछा नही करते, बाइक फर्राटे नही भरती, आवाज़ शून्य हो गयी है वाट्सप कि दुनिया है यहाँ टिक टॉक बना कर अनजानों से लाइक की अपेक्षा करता है और अपनों को मिलने से कतराता है , अनजानों को दोस्त बनाने के लिए अनुरोध किया जाता है , सब कुछ एक क्लिक में हौ जाया करता है , ऑप्शन बहुत है , सच्चे रिश्ते घर मे दम तोड़ देते है ।

ये कमी भी देखने को मिली इस दौर में फिर भी मैं इस दौर में सुकूँ से हूँ, ओर गर्व भी कि हमारे आस पास हमारे दोस्त और बचपन की कहानियाँ मौजूद है जो जीने की राह प्रशस्त करता है यही सब त्योंहार का आनंद दुगना कर देता है । हालांकि शुक्रियाएल watsup तेरा ओर fb का जिन्होंने दूरियां तो रखी पर बातचीत के स्वर जरूर बन्द न किये और संवाद को जारी रखा है, कनेक्टिविटी है , लोग जुड़े है , आपस मे ये बहुत बड़ी उपलब्धि है , न जाने कितने पुराने रिश्ते एक मंच पे आ गए , इसी के कारण 30 बरस पुरानी स्कूल की दोस्ती को शाखें फिर से हरी हो गयी । कुछ नायाब लोगो से मुलाकात हो गयी , नए रिश्ते ओर समूह मिल गए ये वाकई एक महान अनुभव है, बिखरे थे इस रंगों ओ बू में उन गुलो को इकट्ठा किया है इस वट्सअप ने , तो बुरा नही है , कुछ तो अच्छा है मेरे इस जहान में । *अपनो के बिना हर रंग फीका है और हर रात काली है , रंग और रौशनी तो सिर्फ सच्चे दोस्त ही भरते है इसलिए वट्सअप ने कुछ छीना है तो बहुत दिया है इसलिए वट्सअप तेरा आधा शुक्रिया ।

(यह लेख Pwd के प्रभारी सहायक यंत्री रीतेश शर्मा का है।)