ग्वालियर : एकला चलो रे की राह पर कांग्रेस-भाजपा, पद के इंतजार में नेता

विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में आई कांग्रेस की सरकार को 15 महीने में ही ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों ने गिरा दिया। जिसके परिणाम स्वरूप उप चुनाव हुए लेकिन जिला कार्यकारिणी की तरफ ना जिला अध्यक्ष ने रुचि ली न प्रदेश अध्यक्ष ने।

नगरीय निकाय चुनाव

ग्वालियर, अतुल सक्सेना । प्रदेश से सत्ता गंवाने और उसके बाद 28 सीटों के विधानसभा उप चुनावों में महज 9 सीटें जीतने वाली कांग्रेस अभी भी जमीनी स्तर को मजबूत करने पर ध्यान नहीं दे रही। ग्वालियर की बात करें तो पार्टी ने कमलनाथ के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद यहाँ के नेताओं को थोक में प्रदेश कार्यकारिणी में जगह तो दे दी लेकिन ग्वालियर जिले की कार्यकारिणी अभी तक नहीं बनी। जिला अध्यक्ष अपने ढाई साल के कार्यकाल में जिले की कार्यकारिणी घोषित नहीं कर पाए हैं। वहीं भाजपा जिला अध्यक्ष भी अकेले ही जिला संभाले हुए हैं। उन्होंने भी अपनी नियुक्ति के छह महीने बाद भी जिला कार्यकारिणी घोषित नहीं की है।

प्रदेश के उप चुनावों में पूर्व मुख्यमंत्री एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने भले ही एकला चलो की नीति अपनाई हो लेकिन ग्वालियर जिले में कांग्रेस के जिला अध्यक्ष और भाजपा के जिला अध्यक्ष दोनों ही लंबे समय से ये नीति अपनाये हैं। यही कारण है कि कांग्रेस जिला अध्यक्ष डॉ देवेंद्र शर्मा अपने ढाई साल के कार्यकाल के बावजूद अपनी कार्यकारिणी नहीं बनाई है। एमपी ब्रेकिंग न्यूज़ ने जब जिला अध्यक्ष से इसकी वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि कई कारण हैं जिसकी वजह से कार्यकारिणी में देरी हुई। बीच में चुनाव आ गए उसके कारण देरी हुई। चुनाव के बाद कमलनाथ जी से मुलाकात नहीं हो पाई। अभी भी वे दिल्ली में हैं। उनके वापस आते ही जल्दी ही कार्यकारिणी का गठन हो जायेगा अभी तो मैं जैसे तैसे अकेले ही काम चला रहा हूँ। उन्होंने कहा कि उनकी कार्यकारिणी में वरिष्ठ लोगों को प्राथमिकता होगी वहीं ऐसे ऊर्जावान युवा शामिल किये जायेंगे जो कांग्रेस की रीति नीति को जनता तक पहुंचाएं।

पहले बनाई थी सूची जो लीक होने के बाद रद्द हो गई

डॉ देवेंद्र शर्मा मई 2018 में सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की सहमति से ग्वालियर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। उन्होंने कुछ समय बाद जिले की कार्यकारिणी बनाई थी लेकिन सूची को सिंधिया की सहमति मिलती उससे पहले ही ये सूची लीक हो गई जिसके बाद जिला अध्यक्ष ने सूची की रद्द कर दिया। उसके बाद प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद विधायकों और वरिष्ठ नेताओं के बीच सामंजस्य नहीं बैठ पाने के कारण जिले की सूची लटक गई। विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में आई कांग्रेस की सरकार को 15 महीने में ही ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों ने गिरा दिया। जिसके परिणाम स्वरूप उप चुनाव हुए लेकिन जिला कार्यकारिणी की तरफ ना जिला अध्यक्ष ने रुचि ली न प्रदेश अध्यक्ष ने। हाँ उप चुनाव से पहले अशोक सिंह को ग्वालियर ग्रामीण जिला अध्यक्ष बना दिया गया साथ ही शहर और ग्रामीण में चार चार कार्यकारी जिला अध्यक्ष बना दिये गए। खास बात ये है कि पीसीसी चीफ कमलनाथ ने ग्वालियर जिले के बहुत से नेताओं को प्रदेश उपाध्यक्ष, प्रदेश महासचिव और प्रदेश सचिव जरूर बना दिया लेकिन जिले में कांग्रेस मजबूत कौन करेगा इसकी चिंता ना कमलनाथ ने की और न ही जिला अध्यक्ष डॉ देवेंद्र शर्मा ने। यही वजह है कि जिले के नेता पद पाने के लिए परेशान हैं उनका कहना है कि उपचुनाव में तो हमें कोई जिम्मेदारी नहीं मिली अब नगरीय निकाय चुनावों के पहले कोई जिम्मेदारी मिले तो पार्टी को मजबूत करें

भाजपा जिला अध्यक्ष भी 6 महीने से अकेले चला रहे जिला

जिला कार्यकारिणी घोषित करने में भाजपा जिला अध्यक्ष कमल माखीजानी का भी हाल कुछ कांग्रेस जिला अध्यक्ष जैसा ही है। वे भी लंबी समय से जिले की कार्यकारिणी घोषित नहीं कर पाए। मई 2020 में जिला अध्यक्ष की कुर्सी संभालने वाले कमल माखीजानी ने छः महीने बाद भी अपनी कार्यकारिणी नहीं बनाई है। एमपी ब्रेकिंग न्यूज़ ने जब उनसे इसकी वजह पूछी तो उन्होंने विधानसभा उप चुनाव के साथ ही प्रदेश कार्यकारिणी और मंडलों की घोषणा नहीं होना बताया । हालांकि उन्होंने कहा कि एक महीने के अंदर कार्यकारिणी का गठन कर लिया जायेगा। कमल माखीजानी ने कहा कि उनकी कार्यकारिणी में हर जाति, वर्ग के नेता के साथ मंडल को जगह मिलेगी। उन्होंने कहा मेरी प्राथमिकता रहेगी कि जिला कार्यकारिणी में वो अच्छे चेहरे शामिल हो जिनकी समाज में पहचान है, ऊर्जावान हो जो पार्टी की रीति नीति से परिचित हो। शेष निर्णय वरिष्ठ नेतृत्व का रहेगा।

बहरहाल कांग्रेस और भाजपा के जिला अध्यक्ष अभी एकला चलो रे की नीति के तहत अपने अपने हिसाब से जिला चला रहे हैं। अब देखना ये होगा कि कांग्रेस नेताओं का जिले में स्थान पाने का ढाई साल से चला आ रहा इंतजार का खत्म होता है वहीं भाजपा नेताओं का इंतजार कितना लंबा खिंचता है।

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