सियासत के अजब रंग: जो कभी विरोधी थे, आज मिल रहे गले

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ग्वालियर। चुनाव भी एक अजीब तरह का उत्सव होता है । इसमें कब कोई बेगाना हो जाये और कब कोई अपना हो जाये कह नहीं सकते। सत्ता के लालच में नेताओं ने निष्ठाएं खूंटी पर टांग दी है और अवसरवादी मुखौटा लगाकर शान से सिर उठाये घूम रहे हैं। भाजपा कांग्रेस के साथ इन दिनों ऐसा ही हो रहा है। दोनों तरफ के नेता एक दूसरे की पार्टी में शामिल हो रहे हैं।

ग्वालियर के पूर्व उप महापौर और बसपा नेता रामनिवास सिंह गुर्जर ने सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने घर वापसी कर ली यानि उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के हाथी से उतरकर कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। यहाँ बता दे कि रामनिवास सिंह गुर्जर विधानसभा चुनावों में कभी कांग्रेस प्रत्याशी के विरुद्ध चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन बहुत लम्बे अरसे के बाद उनका हृदय परिवर्तन हुआ और वे फिर से कांग्रेसी हो गए। बात सिर्फ राम निवास तक ही सीमित नहीं है। पिछले कुछ दिनों या महीनों में घटे घटनाक्रम पर नजर डालेंगे तो कांग्रेस ऐसे बहुत से लोगों ने वापसी की है जिन्होंने कभी पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाये और दूसरी पार्टी ज्वाइन कर ली। 

चौधरी की वापसी 

इन नेताओं में बहुत बड़ा नाम है चौधरी राकेश सिंह। उनका घटनाक्रम मध्यप्रदेश की राजनीति का ऐसा घटनाक्रम है जिसे भूलना मुश्किल है। उन्होंने तब कांग्रेस का साथ छोड़ा जब पार्टी को उनकी जरुरत थी और भाजपा का साथ देकर कांग्रेस के भाजपा सरकार के खिलाफ लाये गए अविश्वास प्रस्ताव को गिरव दिया। पार्टी के वर्तमान जिला अध्यक्ष डॉ देवेन्द्र शर्मा ने पार्षद का टिकट नहीं मिलने पर पार्टी से बगावत कर ली थी और पार्टी प्रत्याशी के विरुद्ध चुनाव लड़ा था लेकिन आज जिला अध्यक्ष हैं। ग्रामीण अध्यक्ष मोहन सिंह राठौर भी कभी पार्टी प्रत्याशी के विरुद्ध चुनाव मैदान में उतर चुके है। 

समय के फेर में विरोधी अब अपने हुए 

बहुजन संघर्ष दल के सुप्रीमो फूल सिंह बरैया कभी बहुजन समाज पार्टी की ग्वालियर चम्बल में ताकत हुआ करते थे। उनकी जुबान पर हमेशा कांग्रेस के लिए गालियां ही निकलती थी लेकिन आज कांग्रेस के साथ है वो भी स्टार प्रचारक के रूप में। व्यापम के आरोपी जिस गुलाब सिंह किरार की गिरफ्तारी की मांग कभी कांग्रेस जोरशोर से किया करती थी वही गुलाब सिंह किरार आज कांग्रेस के स्टार प्रचारक हैं। ये तो सिर्फ कांग्रेस का लेखाजोखा है। लगभग ऐसा ही कुछ हाल भाजपा में भी हो रहा है। लगता है कि अब राजनीतिक पार्टियों में पार्टी के विरोध में कार्य करना ही आगे बढ़ने का पैमाना बन गया है।