1857 के युद्ध में अंग्रेजों को धूल चटाने वाले रानी लक्ष्मीबाई के मददगार हथियारों और तोप का दशहरे पर हुआ पूजन

स्वर्ण रेखा नदी के पास रानी की समाधि के नजदीक स्थित गंगादास जी की बड़ी शाला में आज भी रानी की मदद करने वाले सैकड़ों साधुओं के हथियार मौजूद हैं जिनकी दशहरे पर पारम्परिक रूप से पूजा की जाती है।

ग्वालियर, अतुल सक्सेना। असत्य पर सत्य की जीत, बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व दशहरा (Dussehra) आज पूरे देश में धूमधाम से मनाया गया। इस मौके पर कई जगह शस्त्र पूजन (Weapon worship on Dussehra) की परंपरा भी निभाई गई।  ग्वालियर में भी शस्त्र पूजन कार्यक्रम आयोजित किया गया। खास बात ये है कि हमेशा की तरह यहां 1857 के युद्ध में प्रयोग हुए शस्त्रों और रानी के साथ युद्ध के दौरान उपयोग की गई तोप का पूजन किया गया।

1857 के युद्ध में अंग्रेजों को धूल चटाने वाले रानी लक्ष्मीबाई के मददगार हथियारों और तोप का दशहरे पर हुआ पूजन

1857 में ग्वालियर में अंग्रेजों से लोहा लेते हुए अंग्रेजी सेना को धूल चटाते शहीद हुई रानी लक्ष्मीबाई (Rani Lakshmi Bai) की यादें अभी भी ग्वालियर में मौजूद हैं। स्वर्ण रेखा नदी के पास रानी की समाधि के नजदीक स्थित गंगादास जी की बड़ी शाला में आज भी रानी की मदद करने वाले सैकड़ों साधुओं के हथियार मौजूद हैं जिनकी दशहरे पर पारम्परिक रूप से पूजा की जाती है।

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इसके अलावा यहाँ मौजूद उस तोप को भी विशेष रूप से पूजा जाता है जिसने अंग्रेजों को लम्बे समय तक प्रवेश से रोके रखा था। ग्वालियर में गंगादास जी की बड़ी शाला में दशहरे के दिन तोप को चलाकर परंपरा निभाई जाती है।  गंगादास की बड़ी शाला के महंत रामदास जी महाराज ने बताया रानी की जान बचाने में 745 साधुओं ने प्राण गवाए थे , 1857 के युद्द में प्रयोग हुए हथियारों और तोप का पूजन किया जाता है और परंपरा को निभाया जाता है।